शनि की साढ़ेसाती में शहर
शहर इन दिनों
कुछ ज़्यादा ही चुप है
जैसे किसी ने उसकी आवाज़
धीरे से गिरवी रख दी हो।
सुबह होती है,
पर उजाला
सीधा सड़कों तक नहीं पहुँचता,
बीच में कहीं
धुँधला-सा ठहर जाता है
जैसे शनि की दृष्टि
रोशनी को भी परख रही हो।
लोग निकलते हैं घरों से,
पर उनके कदमों में
एक अनकही थकान है,
जैसे हर रास्ता
थोड़ा लंबा हो गया हो,
हर मंज़िल
थोड़ी दूर खिसक गई हो।
दफ्तरों की खिड़कियाँ
अब भी खुलती हैं,
पर हवा में
एक अदृश्य बोझ है
जैसे फैसले लेने से पहले
समय खुद
किसी परीक्षा से गुजर रहा हो।
मैं चौराहे पर खड़ा होकर
भीड़ को देखता हूँ
हर चेहरा
अपने ही हिसाब-किताब में उलझा,
जैसे कोई अदृश्य लेखा-जोखा
सबके भीतर चल रहा हो।
शाम ढलती है
तो शहर और भी सिमट जाता है
बत्तियाँ जलती हैं,
पर उजाला
किसी कर्ज़ की तरह लगता है,
जिसे देर-सबेर
चुकाना ही होगा।
कभी-कभी लगता है,
यह साढ़ेसाती
सिर्फ आसमान में नहीं,
हमारे भीतर भी चल रही है
जहाँ हर इच्छा
किसी कसौटी पर रखी हुई है,
और हर सपना
धीरे-धीरे परखा जा रहा है।
रात गहराती है,
तो शहर
अपने ही साये में बैठ जाता है
चुप, स्थिर,
जैसे किसी कठोर शिक्षक के सामने
खड़ा एक विद्यार्थी।
और मैं सोचता हूँ
क्या यह समय
सज़ा है,
या एक लंबी शिक्षा?
क्योंकि शनि
केवल छीनता नहीं,
वह सिखाता भी है
धीरे-धीरे,
बिना शोर के,
अंदर तक उतरकर।
शहर शायद अभी
उसी सीख में डूबा है
जहाँ हर खोई हुई चीज़
एक नए अर्थ में लौटेगी,
और हर भारी साँस के बाद
एक गहरी समझ
जन्म लेगी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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