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Sunday, 26 April 2026

मंगल दोष और दंगे

 मंगल दोष और दंगे

कहते हैं

मंगल जब बिगड़ता है,

तो सिर्फ कुंडली नहीं,

खून का रंग भी बदल जाता है।


शहर इन दिनों

कुछ ज़्यादा ही लाल है

दीवारों पर,

नारों में,

और लोगों की आँखों में भी

एक तीखी-सी आग जल रही है।


सुबह की शुरुआत

अब अख़बार से नहीं,

खबरों की चीख से होती है

कहीं आग लगी,

कहीं पत्थर चले,

कहीं नाम पूछकर

इंसान को बाँट दिया गया।


मैं सोचता हूँ,

क्या यह सचमुच

मंगल का दोष है?

या हमने ही

अपने भीतर के युद्ध को

किसी ग्रह के माथे मढ़ दिया है?


गली के मोड़ पर

दो लड़के खड़े हैं

एक के हाथ में पत्थर,

दूसरे की मुट्ठी में

किसी पुरानी नफ़रत की चिंगारी।

दोनों की उम्र

लगभग बराबर है,

पर उनके बीच

सदियों की दूरी खड़ी है।


घर के अंदर

माएँ दरवाज़े बंद कर रही हैं,

और बच्चों को

धीरे से समझा रही हैं

“आज बाहर मत जाना…”

उनकी आवाज़ में

डर कम,

थकान ज़्यादा है।


शाम होते-होते

धुआँ शहर पर

एक परत-सा बिछा देता है

जैसे किसी ने

आकाश को भी

गवाह बनने से रोक दिया हो।


कभी-कभी लगता है,

यह दंगे

अचानक नहीं होते

ये धीरे-धीरे पकते हैं,

ठीक वैसे ही

जैसे किसी कुंडली में

दोष सालों तक

अपना समय इंतज़ार करता है।


रात को

जब सब कुछ शांत दिखता है,

तब भी

अंदर कहीं

आग बुझी नहीं होती

वो राख के नीचे

धीरे-धीरे साँस लेती रहती है।


और मैं

इन सबके बीच खड़ा,

यह समझने की कोशिश करता हूँ

कि क्या सच में

ग्रहों की चाल

इतनी हिंसक हो सकती है,

या हम ही

अपने क्रोध को

आकाश की तरफ़ उछालकर

खुद को निर्दोष साबित करना चाहते हैं?


क्योंकि अगर

मंगल दोष है भी,

तो शायद

सबसे पहले

उसे हमारी आँखों में,

हमारी भाषा में,

और हमारे इरादों में

ठीक होना चाहिए।


तभी

किसी दिन

यह शहर

लाल नहीं,

फिर से

सिर्फ एक साधारण रंग में

साँस ले पाएगा।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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