पचपन वर्ष की आयु में जाकर उसे यह पता चला कि उसे पीला रंग पसन्द है।
यह सुनने में कोई विशेष खोज नहीं लगती।
लोगों को अपने प्रिय रंग प्रायः बचपन से मालूम होते हैं। कोई नीले की बात करता है, कोई लाल की, कोई काले की।
पर उसके साथ ऐसा नहीं था।
वह जीवन का अधिकांश भाग दूसरों की पसन्द-नापसन्द समझने में बिताती रही थी। पति को कौन-सी चाय पसन्द है, बच्चों को कौन-सा खाना, मेहमानों को किस कमरे में बैठना अच्छा लगेगा।
धीरे-धीरे वह स्वयं अपने ही जीवन में एक अतिथि बन गई थी।
इसलिए जब एक दिन उसने अपने घर में पीले रंग की बढ़ती हुई उपस्थिति देखी, तो वह चौंकी।
एक मनोवैज्ञानिक मित्र ने कभी उससे कहा था
"मनुष्य का अवचेतन उन चीज़ों को चुन लेता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है, भले ही उसकी चेतना को इसका पता न हो।"
उस समय उसने इस वाक्य पर विशेष ध्यान नहीं दिया था।
लेकिन अब उसे लगा कि शायद यह बात उसके पीले रंग पर लागू होती है।
उसने पढ़ना शुरू किया।
उसे पता चला कि रंगों के मनोविज्ञान पर बहुत शोध हुआ है।
पीला रंग मस्तिष्क में सजगता, जिज्ञासा और आशा से जुड़ा माना जाता है।
कुछ वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि चमकीले पीले रंग दृश्य तंत्रिका को तीव्रता से सक्रिय करते हैं। इसी कारण चेतावनी के संकेतों, स्कूल बसों और कई सुरक्षा चिह्नों में पीले रंग का प्रयोग किया जाता है।
पर पीले का एक दूसरा पक्ष भी है।
अत्यधिक पीला बेचैनी पैदा कर सकता है।
यह रंग प्रसन्नता का भी है और अस्थिरता का भी।
उसे यह बात अजीब लगी।
क्योंकि उसके अपने जीवन में भी यही दो ध्रुव हमेशा साथ रहे थे।
वह बाहर से प्रसन्न दिखाई देती थी।
अन्दर से बेचैन रहती थी।
लोग उसे हँसते हुए देखते थे।
पर उसके भीतर हमेशा कोई प्रश्न जागता रहता था।
मानो उसकी आत्मा किसी उत्तर की प्रतीक्षा में हो।
उसने एक लेख में पढ़ा कि कार्ल युंग के कुछ अनुयायी पीले रंग को चेतना और आत्मबोध से जोड़ते हैं।
सूर्य का रंग।
प्रकाश का रंग।
वह रंग जो अन्धकार को हटाता है।
उस रात वह देर तक जागती रही।
उसे अचानक लगा कि शायद वह पीले रंग को पसन्द नहीं करती।
शायद उसका मन प्रकाश की तलाश करता रहा है।
और पीला रंग उसी तलाश का दृश्य रूप है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
उसने अपनी अलमारी खोली।
पीले दुपट्टे को बाहर निकाला।
उसे गोद में रखकर देर तक बैठी रही।
वह सोचती रही कि क्या रंग केवल रंग होते हैं?
या वे हमारी अधूरी कहानियों के संकेत भी होते हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस प्रकाश की उसे जीवन भर तलाश थी, उसका एक छोटा-सा अंश वह अनजाने में कपड़ों, परदों और फूलदानों में इकट्ठा करती रही?
खिड़की के बाहर रात उतर आई थी।
लेकिन सड़क के लैम्प की रोशनी कमरे में आ रही थी।
वह भी हल्की पीली थी।
और पहली बार उसे लगा कि शायद हम रंगों को नहीं चुनते।
हमारी आत्मा उन रंगों की ओर धीरे-धीरे खिंचती है जिनमें उसकी कोई अनकही आवश्यकता छिपी होती है।
उसने डायरी में लिखा—
"पीला रंग मुझे इसलिए प्रिय नहीं कि वह सुन्दर है। शायद इसलिए कि वह मेरे भीतर के अँधेरे को सबसे अच्छी तरह पहचानता है।"
लिखकर उसने कलम रख दी।
लेकिन कहानी अभी शुरू ही हुई थी।
क्योंकि अगले कुछ दिनों में उसे पता चलने वाला था कि पीले रंग से उसका सम्बन्ध केवल मनोविज्ञान का नहीं, स्मृति का भी है।
बहुत पुरानी स्मृतियों का।
इतनी पुरानी कि शायद वे उसके बचपन से भी पहले की थीं।
(क्रमशः)
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