शब्द मेरे पास आते रहे
जैसे प्यासे पक्षी
किसी सूखती हुई झील पर उतरते हैं
मैं उन्हें पानी समझता रहा
वे मुझे सांत्वना देते रहे
पर एक दिन जाना
कि शब्द प्यास नहीं बुझाते
वे सिर्फ यह बताते हैं
कि भीतर कहीं
अब भी एक प्यास बाकी है
जिसका नाम लेना भी
कई बार संभव नहीं होता।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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