प्रेम की सुगन्ध हवा में नहीं,
रूह के अंदर कहीं जलती रहती है।ना वह फूलों से बंधी है,
ना किसी नाम की मोहताज।
वह हर धड़कन में एक धीमी सी लौ है,
जो बिना देखे भी दिखाई देती है।
सूफ़ी दरवेशों की तरह वह भी घूमती है,
कभी यादों के शहर में,
कभी विरह की रेत पर,
और हर जगह बस एक ही नाम छोड़ जाती है—चुप्पी।
मुकेश ,,,,,
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