होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 7 June 2026

इश्क़ की गन्ध

 इश्क़ की गन्ध

इश्क़ की गन्ध हवा में नहीं होती,
वह सीधा रूह में उतर जाती है।
ना उसे देखा जा सकता है,
ना छुआ जा सकता है किसी हथेली से।
वह एक धीमी सी आग है भीतर की,
जो बिना धुएँ के जलती रहती है।
सूफ़ी कहते हैं—इश्क़ एक महक है,
जो खुदा और इंसान के बीच बहती है,
और हर साँस को सजदा बना देती है।


मुकेश ,,,,,

No comments:

Post a Comment