मैंने अपने भीतर उतरने की कई बार कोशिश की
हर बार कुछ दूर जाकर लौट आया
वहाँ कोई राक्षस नहीं था
कोई भयावह स्मृति भी नहीं
फिर भी एक झिझक थी
जैसे कोई आदमी
बरसों बाद अपने ही पुराने घर में प्रवेश करे
और उसे डर हो
कि कहीं दीवारें
उसे पहचान न लें।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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