होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 31 July 2017

सपनो में कभी कोई राजकुमारी नहीं आयी

सपनो में कभी कोई राजकुमारी नहीं आयी
------------------------------------------------

मेरे
सपनो में कभी कोई
राजकुमारी नहीं आयी
उसके
सपनो में भी कोई
राजकुमार और  घोडा नहीं आता था

शायद सपने भी औकात देख कर आते हैं

उसका बाप कचहरी में चपरासी था
मेरा बाप भी सरकारी बाबू

उसे मेरे स्कूल आने जाने और
खले के मैदान जाने  का वक़्त पता था

मुझे भी उसके सहेलियों के झुण्ड में
स्कूल आने जाने का वक़्त पता था
वह कब छत पे आएगी पता होता

काफी दिन तो एक दुसरे को सिर्फ देखते थे
मैँ अपनी साइकिल तेज़ कर लेता
वो भी तेज़ कदमो से घर की तरफ चल देती

एक दो बार दरवाज़े पे कागज़ की पुर्ज़ियों में
ख़त भी फेंके गए

आस पड़ोस में फुसफुसाहट शुरू होती इसके पहले

उसके जीवन में एक राजकुमार आ गया
जो सपनो में  नहीं आया था कभी
उस सच्ची मुच्ची के राजकुमार के घोड़े  की पूछ में
सरकारी बाबू का टैग लगा
और मेरी पुरानी कमीज में
'बेरोज़गारी' का टैग मुँह चिढ़ा रहा था

जिस दिन वो राजकुमार अपने घोड़े पे अपनी
राजकुमारी लेने आया
उस दिन मैंने अकेले में कई पैकेट सिगरेट पिया
पहली बार
खांसते खांसते अपने सबसे खास दोस्त के साथ
बहुत दूर तक पैदल टहलता रहा

दुसरे दिन राजकुमारी अपने राजकुमार के साथ
शहर छोड़ के जा चुकी थी

और मै भी महानगर के रास्ते में था

ये मेरे जीवन के पहले और अंतिम प्रेम का अंत था

मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

फ़क़त धूप ही धूप थी कोई साया न था

फ़क़त धूप ही धूप थी कोई साया न था
तुम्हारे जाने के बाद कोई हमारा न था

इक तुम ही तो थे, जिस्से सबकुछ कहा
किसी और को दर्द अपना सुनाया न था

किसी के पास मेरे ज़ख्म की दवा न थी
इसी लिए घाव किसी को दिखाया न था

तुमसे मिल कर हंसा था इक दिन फिर
उम्र भर बाद उसके खुलकर हंसा न था

इक दिन तूने मेरी हथेलो को चूमा था
बहुत दिनों तक हथेली को धोया न था

मुकेश ख़ुदा और मुहब्बत के सिवा मैंने
किसी और दर पे सिर को झुकाया न था

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

Sunday, 30 July 2017

साथ साथ चलें

काश !
हम तुम साथ साथ चलें
और
रुक जाए 'वक़्त '

मुकेश इलाहाबादी -------

Saturday, 29 July 2017

मेरा ख़त,

मेरा ख़त,
मेरा ख़त पढ़ पढ़ के अकेले में हंसा करते हो
मुझसे मुहब्बत नहीं तो क्यूँ पढ़ा करते हो ??
मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

ज़िंन्दगी कुछ इस तरह गुज़रती है -----------------------------------------

ज़िंन्दगी कुछ इस तरह गुज़रती है
-----------------------------------------


सुबह
होते ही तेरी यादों के फूल
खिल उठते हैं
और मेरी सुबह महक उठती है

दोपहर
ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप
तुम्हारी हँसी की
छाँव में गुज़र जाती है

सांझ
यादों की झील में
चाँद बन उतर आती हो तुम
और मेरी रात चाँदनी चाँदनी हो जाती है

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

खनखनाती हंसी के

उस
दिन से मै
बहुत अमीर हो गया
जिस दिन से
तुम्हारी
खनखनाती हंसी के
सिक्के मेरी जेब में आये
(सुमी )

मुकेश इलाहाबादी -----

Friday, 28 July 2017

खुली आँखे तेरी राह तकती हैं

खुली आँखे तेरी राह तकती हैं
बंद आँखे तेरे ख्वाब देखती हैं
तू मेरे मुक़द्दर में नहीं,ये बात
मेरे  हाथ  की लकीरें कहती हैं  
तुझसे तो अच्छी तेरी तस्वीर
मेरी नज़्म व ग़ज़लें सुनती है  

मुकेश इलाहाबादी -----------