अग्नि की सात जिह्वाएँ — विस्तारपूर्वक तात्त्विक विवेचन
ऋग्वेद में अग्नि को केवल भौतिक अग्नि नहीं, बल्कि दैवी चेतना का प्रथम प्रकाश कहा गया है। ब्रह्म के अव्यक्त से जो प्रथम ज्योति उत्पन्न हुई, वही अग्नि कहलाती है। यही अग्नि आगे चलकर देवता, यज्ञ, जीवनशक्ति और ज्ञान — चारों रूपों में व्याप्त होती है।
शास्त्रों में अग्नि की सात जिह्वाएँ (Tongues of Fire) कही गई हैं — जो उसकी सात क्रियाओं, सात चेतन तरंगों और सात रंगों का प्रतीक हैं।
1. काली (Kālī)
अर्थ: यह अग्नि की प्रथम जिह्वा है — तीव्र, प्रचंड और संहारक।
तात्त्विक अर्थ: यह अज्ञान और अशुद्धता को जलाकर नष्ट करती है। यह अहंकार-दहन की ज्वाला है।
आध्यात्मिक अर्थ: साधक के भीतर जो तपस्या की ज्वाला है, वही काली जिह्वा है — जो उसे भीतर से शुद्ध करती है।
नज़्म:
काली ज्वाला, तू जलती क्यों है इतनी भीतर?
क्या मैं अभी अधूरा हूँ, या तू मुझे पूर्ण बना रही है?
हर बार जब मैं टूटता हूँ, तू मुझे नया आकार देती है—
जैसे राख में से जन्म लेता है जीवन का अर्थ।
2. कराली (Karālī)
अर्थ: भयानक रूप वाली, संहार और रूपांतरण की शक्ति।
तात्त्विक अर्थ: यह परिवर्तन की अग्नि है। पुराना नष्ट करती है ताकि नया जन्म ले सके।
आध्यात्मिक अर्थ: यह मृत्यु की प्रतीक नहीं, नवजीवन की प्रसूति है।
नज़्म:
कराली, तेरी आँखों में बिजली चमकती है,
हर गिरा हुआ स्वप्न, तेरे पाँव तले अंकुर बनता है।
तू डर नहीं, तू परिवर्तन है—
तू हर अंत में आरंभ का गीत गाती है।
3. मनो-जवा (Manojavā)
अर्थ: मन के समान तीव्र गति वाली।
तात्त्विक अर्थ: यह चेतना की गति है — विचार से भी तेज।
आध्यात्मिक अर्थ: यह साधक की प्रार्थना को तुरंत ब्रह्म तक पहुँचाती है।
नज़्म:
मनो-जवा, तू उड़ जाती है मेरे मन से पहले,
वह शब्द जो मैं कह न पाया, तू उसे अग्नि में कह देती है।
तेरी लपटों में मेरी कामना नहीं, बस एक वाक्य है—
"मैं अस्तित्व का हिस्सा हूँ।"
4. सुलोहिता (Sulohitā)
अर्थ: लालिमा लिए हुई, सृष्टि की उष्मा से भरी।
तात्त्विक अर्थ: यह सृजन की अग्नि है — जीवन, प्रेम, और करुणा की लहर।
आध्यात्मिक अर्थ: यह ब्रह्म की “इच्छा शक्ति” (इच्छाशक्ति) का प्रतीक है।
नज़्म:
सुलोहिता, तेरे आँचल में संसार पलता है,
तेरे लाल उजास में बीज फूटते हैं,
प्रेम तेरी ही छाया है,
और करुणा तेरे ही उष्म हृदय की धड़कन।
5. सुधूम्रवर्णा (Sudhūmra-varṇā)
अर्थ: धुएँ के समान वर्ण वाली, ढकी हुई चेतना।
तात्त्विक अर्थ: यह माया और रहस्य की ज्वाला है — जो सत्य को ढँक भी लेती है और प्रकट भी करती है।
आध्यात्मिक अर्थ: साधक जब भ्रम में होता है, तो यह अग्नि उसकी अंतर-दृष्टि की परीक्षा लेती है।
नज़्म:
सुधूम्रवर्णा, तू क्यों छिपा लेती है मुझे मुझसे?
तेरे धुएँ में कभी मैं खुद को खो देता हूँ,
कभी पा भी लेता हूँ—
जैसे सत्य धुँध में मुस्कुराता हो।
6. स्फुलिंगिनी (Sphuliṅginī)
अर्थ: चिंगारियाँ उड़ाने वाली।
तात्त्विक अर्थ: यह प्रेरणा की अग्नि है — ज्ञान के बीज जगाती है।
आध्यात्मिक अर्थ: यह तप के फलस्वरूप उत्पन्न अंतर्ज्योति है।
नज़्म:
स्फुलिंगिनी, तेरे छोटे-छोटे चिंगारियों में संसार छिपा है,
एक विचार, एक लय, एक नया श्वास।
जब मैं थक जाता हूँ, तू भीतर से कहती है
"उठो, अभी प्रकाश अधूरा है।"
7. विश्वरूपी (Viśvarūpī)
अर्थ: समस्त रूपों वाली, सर्वव्यापी अग्नि।
तात्त्विक अर्थ: यह परब्रह्म की ज्वाला है — जो सृष्टि के हर कण में विद्यमान है।
आध्यात्मिक अर्थ: यहाँ साधक और अग्नि में भेद नहीं रहता। साधक अग्नि बन जाता है।
नज़्म:
विश्वरूपी, तू हर रूप में है—
मेरी साँस, मेरा शब्द, मेरा मौन।
अब मैं नहीं बोलता, तू बोलती है मुझसे,
अग्नि अब बाहर नहीं, मैं स्वयं अग्नि हूँ।
मुकेश ,,,,,,,,
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