होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 24 February 2026

वो अधूरी रात

 वो अधूरी रात


वो रात पूरी तो थी,

पर महसूस अधूरी होती रही।


खिड़की से झाँकता चाँद

जैसे कुछ कहना चाहता हो,

और कमरे की ख़ामोशी

हर शब्द से पहले थम जाती हो।


चाय ठंडी हो गई थी,

घड़ी चल रही थी,

पर समय कहीं रुक-सा गया था।

मोबाइल की स्क्रीन पर

उसका नाम नहीं चमका,

बस एक खाली इंतज़ार टिमटिमाता रहा।


उसने खिड़की बंद की,

दीया बुझाया,

और तकिये के नीचे

अपने सवाल रख दिए।


सुबह हुई—

रात बीत गई,

पर जो कहना था

वो कहा नहीं गया।


इसलिए

वो रात पूरी होकर भी

हमेशा

अधूरी रह गई।


मुकेश ,,,,

No comments:

Post a Comment