लड़कियाँ जब पहली बार "ना" कहती हैं...
लड़कियाँ
जब पहली बार "ना" कहती हैं,
तो दुनिया थोड़ी चुप हो जाती है
जैसे किसी मंदिर की घंटी के बाद
एक लंबी मौन सी लहर फैल जाती है।
ये "ना"
सिर्फ़ इनकार नहीं होता,
ये एक दरवाज़ा बंद करने का नहीं,
ख़ुद को पहली बार भीतर से खोलने का ऐलान होता है।
जब वे कहती हैं "ना",
तो वो डर,
जो बरसों से उनकी पलकों पर टिका था
धीरे-धीरे उतरने लगता है।
ये "ना"
उन अनगिनत "हाँ" का उत्तर होता है,
जो उन्होंने कभी माँ-बाप की उम्मीदों के लिए,
कभी समाज की तर्जनी के डर से कहा था।
पहली बार
जब वे अपनी हिचकियों को काटकर बोलती हैं
"नहीं, ये मेरा रास्ता नहीं है,"
तो समझो उन्होंने अपनी ज़मीन पहचान ली है।
अब कोई उंगली नहीं उठती,
तो भी उठती हैं वे
अपने लिए,
अपने शब्दों में,
अपने वजूद के पक्ष में।
लड़कियाँ जब पहली बार "ना" कहती हैं,
तो वो सिर्फ़ विरोध नहीं करतीं
वे अपने भीतर
एक छोटा-सा सूरज जला लेती हैं।
और उस उजाले में
वे खुद को
पहली बार पूरा देख पाती हैं
सच में,
जैसी हैं, वैसी।
मुकेश ,,,,,,,,,
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