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Wednesday, 25 February 2026

जब लड़कियाँ पहली बार आईने में खुद को देखती हैं — बिना डर के…

 जब लड़कियाँ पहली बार आईने में खुद को देखती हैं — बिना डर के…


जब लड़कियाँ

पहली बार

आईने में खुद को देखती हैं 

बिना डर के,

बिना जजमेंट के,

बिना उस सवाल के कि "क्या मैं ठीक लग रही हूँ?" 

तो आईना भी थोड़ी देर साँस रोक लेता है।


वो खुद को

सिर्फ़ एक चेहरा नहीं,

एक मुकम्मल कहानी की तरह देखती हैं 

जिसमें आँखों के नीचे की थकान

किसी हार की नहीं,

बल्कि लड़ाइयों की जीत होती है।


उनकी नाक, होंठ, त्वचा,

जो अक्सर

किसी फ़िल्टर या ताने की ज़द में रहे,

अब बस… "अपनी" लगती है।


जब लड़कियाँ

आईने में खुद को पहली बार "कम नहीं" समझतीं 

तो वो उस पल

किसी परी कथा की राजकुमारी नहीं,

बल्कि अपनी ही दुनिया की रानी बन जाती हैं।


वे मुस्कराती हैं 

जैसे किसी गहरे पानी में

अपनी परछाईं को पहली बार गले लगा रही हों।


अब कोई और

उन्हें "सुधारने" की सलाह नहीं दे सकता 

क्योंकि उन्होंने खुद से कह दिया है 

"मैं जैसी हूँ, मैं पूरी हूँ।"


जब लड़कियाँ

आईने में खुद को देखती हैं बिना डर के,

तो वो आईना

अब सिर्फ़ काँच नहीं रहता 

वो एक दरपन बन जाता है 

जिसमें उन्हें

उनका आत्मा-रूप दिखता है।


मुकेश ,,,,,,,,

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