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Wednesday, 25 February 2026

तुम, तनहाई, तुम्हारा बिस्तर और मोबाइल

 तुम, तनहाई, तुम्हारा बिस्तर और मोबाइल

रात के आख़िरी पहर में

जब दीवारों पर टंगी घड़ी

अपनी ही धड़कन सुनती है,

तुम अपने बिस्तर के कोने पर सिमटी होती हो

जैसे कोई सवाल

अपने ही जवाब से डर रहा हो।


तकिये की सिलवटों में

दिन भर की थकान पड़ी रहती है,

और चादर पर

तुम्हारी उंगलियों के हल्के-हल्के निशान

जैसे किसी ने ख़ामोशी से

किसी का नाम लिखा हो

और फिर खुद ही मिटा दिया हो।


मोबाइल की नीली रौशनी

तुम्हारे चेहरे पर गिरती है,

एक ठंडी चाँदनी की तरह—

बिना मौसम, बिना आसमान।

वो रौशनी

तुम्हारी आँखों में उतर कर

पुराने चैट, अधूरी बातें,

और “last seen” का सूखा सा सच

फिर से जगा देती है।


तुम उँगलियों से

स्क्रीन पर रिश्तों को स्क्रॉल करती हो—

कुछ हँसते हुए इमोजी,

कुछ आधे-अधूरे वादे,

कुछ तस्वीरें

जिनमें मुस्कुराहटें पूरी थीं

मगर इरादे आधे।


तनहाई

कोई शोर नहीं करती—

वो बस तुम्हारे पास बैठ जाती है,

तुम्हारे बालों में हाथ फेरती है

और कहती है—

“देखो, सब यहीं है,

बस वो नहीं है

जिसके लिए तुम जाग रही हो।”


बिस्तर तुम्हारा हमराज़ है,

वो जानता है

किस करवट पर आह निकलती है,

किस करवट पर आँख भर आती है।

मोबाइल तुम्हारा आईना है

वो दिखाता है

कि कितने लोग “online” हैं

और कितनी दूरियाँ “active”।


तुम एक मैसेज लिखती हो—

“कैसे हो?”

फिर उसे मिटा देती हो।

जैसे दिल ने दरवाज़ा खोला हो

और अक़्ल ने चुपके से

कुंडी चढ़ा दी हो।


रात बढ़ती जाती है,

बैटरी गिरती जाती है,

और तुम्हारी उम्मीद

चार्जर ढूँढती रहती है।


आख़िरकार

तुम मोबाइल को सीने पर रख

आँखें बंद कर लेती हो

जैसे किसी का हाथ हो

जो अब सिर्फ़

वज़न भर रह गया है।


और तनहाई

वो मुस्कुरा कर

तुम्हारे पास लेट जाती है,

बिलकुल बराबर में,

जहाँ कभी

कोई और हुआ करता था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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