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Wednesday, 25 February 2026

रात, रजनीगंधा और तुम

 रात, रजनीगंधा और तुम


रात ने धीरे से

अपने काले आँचल को खोला,

और आँगन में

रजनीगंधा की गंध उतर आई।


हवा में कुछ था

मंद, मीठा, अनकहा;

जैसे तुम्हारा नाम

किसी ने बहुत धीरे से पुकारा हो।


रजनीगंधा की कलियाँ

अँधेरे में ही खिलती हैं,

ठीक वैसे ही

जैसे तुम्हारी मुस्कान

मेरी खामोशियों में।


मैंने उस सुगंध को छुआ

वह स्पर्श नहीं थी,

पर स्मृति थी;

तुम्हारे कंधे पर टिके

एक पुराने पल की तरह।


रात लंबी थी,

पर बोझिल नहीं

उसमें तुम्हारी आहट थी,

और फूलों की उजली साँसें।


चाँद दूर खड़ा

सब देखता रहा,

पर उसने भी स्वीकारा

कि इस समय

रात से अधिक उजली

रजनीगंधा थी,

और रजनीगंधा से अधिक

तुम।


सुबह होगी तो

गंध हल्की पड़ जाएगी,

पर यह रात

मेरी हथेली में

सुगंध बनकर ठहर जाएगी

रात, रजनीगंधा

और तुम।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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