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Wednesday, 25 February 2026

दीवार से लगी सिसकियाँ

दीवार से लगी सिसकियाँ

आज फिर देर तक जागती रहीं,

जैसे ईंटों के भीतर

किसी ने अपना दिल चुनवा दिया हो।


चूने की परतों के पीछे

कुछ नम शब्द हैं,

जो हर रात भीगते हैं

और सुबह सूखने का अभिनय करते हैं।


मैंने कान लगाकर सुना

कोई नाम बार-बार टकराता था,

फिर टूटकर

सफ़ेद धूल में बदल जाता था।


यह घर पुराना नहीं,

बस यादें ज़्यादा हैं इसमें;

हर कोना एक अधूरी बात

धीरे-धीरे दोहराता है।


दीवारें बोलती नहीं,

पर उनके सहारे

कितने कंधे रो चुके हैं

किसी की जुदाई,

किसी का अपमान,

किसी का अनकहा प्रेम।


सिसकियाँ पूछती हैं

क्या दर्द भी विरासत होता है?

जो एक पीढ़ी से

दूसरी की हथेली तक

चुपचाप चला आता है।


रात गहराती है,

पर दीवार से लगी सिसकियाँ

थकती नहीं

वे जानती हैं

कि आँसू सूख भी जाएँ,

नमी देर तक रहती है।


और शायद

उसी नमी में

कोई नया सपना

चुपचाप अंकुरित होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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