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Tuesday, 24 February 2026

रात का रहस्य

 रात का रहस्य


काली रात की तहों में

एक अनदेखा रास्ता खुलता है

न धरती का,

न आकाश का,

बस दिल की किसी भीतरी दरार का।


चाँद आज पूरा नहीं,

पर उसकी अधूरी रोशनी

जैसे किसी गुप्त संकेत की तरह

पानी पर काँप रही है।


मैं चलता हूँ

रेत पर नहीं,

अपनी ही परछाइयों पर।

हर कदम के साथ

पीछे छूटती है

एक पुरानी पहचान।


दूर कोई दीप नहीं जलता,

फिर भी दिशा साफ़ है;

जैसे किसी ने

बिना दिखे

मुझे पुकारा हो।


हवा में नमक नहीं,

एक अजीब-सी ख़ुशबू है

याद और प्रतीक्षा के बीच की।


मैं दरवाज़े तक नहीं पहुँचता,

दरवाज़ा मेरे भीतर खुलता है।

कोई दस्तक नहीं देता,

फिर भी

किसी की आहट

रगों में उतर आती है।


और अचानक

वक़्त ठहर जाता है।

न रात आगे बढ़ती है,

न साँस पीछे लौटती है।


उस अँधेरे में

कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता,

सिर्फ़ आँखों की दो हल्की लौ

जैसे ब्रह्मांड की पहली चिंगारी।


वो कुछ कहती नहीं,

पर सन्नाटा बदल जाता है;

दीवारें गहरी हो जाती हैं,

और दूरी

अपने अर्थ खो देती है।


मैं समझता हूँ

यह मिलन बाहर का नहीं,

रूह के किसी बंद कक्ष का है,

जहाँ नाम, शरीर, पहचान

सब उतर जाते हैं।


और जब सुबह की पहली रेखा

क्षितिज पर उगती है,

तो मैं वहीं खड़ा होता हूँ

पर वैसा नहीं रहता।


क्योंकि कुछ रातें

सिर्फ़ बीतती नहीं,

आदमी को बदल देती हैं।


और कुछ मुलाक़ातें

इतनी रहस्यमय होती हैं

कि उन्हें बयान करना

उनका अपमान है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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