मैं मंगल ग्रह से, तुम शुक्र ग्रह से
मैं आया हूँ
मंगल से
लाल, धूल-भरा,
थोड़ा सूखा,
थोड़ा कठोर।
तुम उतरी हो
शुक्र से
धुँधली उजास में लिपटी,
गर्म, दैदीप्यमान,
रहस्यों की परतों में ढँकी।
कहते हैं,
मंगल पर कभी जल रहा होगा
बहती रही होंगी नदियाँ,
उगा होगा जीवन का कोई बीज।
पर समय की आँधियों ने
उसे रेगिस्तान बना दिया।
और शुक्र
वह तो आकार में पृथ्वी का जुड़वाँ कहा गया,
पर उसके बादलों में
सल्फ़्यूरिक अम्ल की बारिश है,
तापमान इतना
कि धातु भी पिघल जाए।
विज्ञान कहता है
हम दोनों ग्रह
कभी एक-से थे,
पर वायुमंडल ने
हमारी नियति बदल दी।
और प्रेम भी तो
वातावरण का ही खेल है
भीतर की हवाएँ
कैसी बहती हैं,
इस पर निर्भर करता है
कि कोई संबंध
जीवन रचता है
या दहन।
मैं
तर्क का भूगोल लिए,
क्रेटरों-सा मौन।
तुम
भावनाओं का दाब लिए,
घने बादलों-सी चुप।
मेरे यहाँ
ओलिंपस मॉन्स-सी ऊँचाइयाँ हैं
अहं की,
जिद की।
तुम्हारे यहाँ
घूमते तूफ़ान हैं—
अनकहे शब्दों के,
अधूरे स्पर्शों के।
शोध बताता है
मंगल की सतह पर
आज भी बर्फ़ जमी है ध्रुवों पर।
शायद मेरे भीतर भी
कुछ कोमल हिमखंड शेष हैं।
और शुक्र
भले बाहर से दहकता हो,
पर उसकी चमक
सांध्य तारे की तरह
धरती के प्रेमियों को दिशा देती है।
तुम्हारी आँखों में भी
वही सांध्य-दीप्ति है
जो कठोर मनुष्य को
कवि बना दे।
मैं मंगल से हूँ
युद्ध का प्रतीक।
तुम शुक्र से हो—
सौंदर्य का प्रतीक।
पर क्या यह महज़ प्रतीक है?
खगोलशास्त्र कहता है
हम दोनों ग्रह
सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
एक ही केंद्र,
एक ही गुरुत्व।
तो फिर
तुम और मैं भी
किसी एक ही सूर्य के चारों ओर
चक्कर लगा रहे होंगे
शायद उसे
प्रेम कहते हैं।
हो सकता है
हम कभी एक-दूसरे पर उतर न पाएँ,
न तुम्हारी तपिश सह पाऊँ,
न तुम मेरी विरानगी।
पर जब भी
सांझ ढलेगी,
आकाश में
शुक्र चमकेगा
और दूर कहीं
मंगल लाल बिंदु-सा दिखेगा
लोग कहेंगे—
दो अलग ग्रह हैं।
पर मैं जानता हूँ
हम दोनों
एक ही ब्रह्मांड की
अधूरी कविता हैं।
मैं मंगल से आया हूँ,
तुम शुक्र से आयी हो
और पृथ्वी के इस छोटे-से घर में
हम रोज़
अपना-अपना वातावरण बदलकर
एक-दूसरे के रहने लायक
बनने की कोशिश करते हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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