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Monday, 23 February 2026

पहाड़ और स्नो व्हाइट

 पहाड़ और स्नो व्हाइट

(पुणे की शांत पहाड़ी इलाके में एक शांत जगह में ऑफिस - ऑफिस से कुछ दूर कुछ विरल बस्तियां , कुछ रईसों के फार्म हाउस, 

ऑफिस से दिखती पहाड़ों की शांत श्रृंखलाओं के बीच उपजी ये कथा )

ऑफिस।

मेज़ – पूरब की ओर।

खिड़की – पूरब की ओर।

और खिड़की के पार पहाड़ – पूरब की ओर।

आज भी खिड़की खुली है।

दिवाकर अपने सातों रंग समेटे मेज़ पर पसरा है।

पहाड़ खिला हुआ है—हरे, भूरे, मटमैले रंगों में अपनी समूची भव्यता के साथ।

मानो इंद्रधनुष आसमान से उतरकर पहाड़ पर पसर गया हो।

पहाड़ आज भी मौन है,

पर भीतर कहीं खिलखिला रहा है।

मौन आज मैंने तोड़ा—

“दोस्त! हर रोज़ एक अंतहीन यात्रा शुरू होती है।

सुबह सपनों के साथ।

उम्मीदों के साथ।

पर जैसे-जैसे रोशनी बढ़ती है,

सपने धुँधलाने लगते हैं।

दोपहर होते-होते

आँखों में अँधेरा उतर आता है।

शाम तक भीतर और बाहर—

दोनों ओर सन्नाटा भर जाता है।

फिर रात आती है

और टूटे सपने

फिर से जुड़ने लगते हैं—

नए सपने बुनने के लिए।


आज तुम्हारी आँखों में भी मुस्कान है।

क्या तुम्हारा कोई सपना सच हुआ है?”

पहाड़ ने धीमे स्वर में कहा—

“दोस्त, दुनिया एक सपना है।

सपना ही वर्तमान है,

सपना ही भूत,

सपना ही भविष्य।

सपने हैं तो जीवन है।

सपने खत्म—तो जीवन खत्म।

पर पत्थर सपने नहीं देखते।

मैं भी नहीं देखता।

हाँ, सपने देखने वालों को देखा है।

सपनों को टूटते देखा है।


आओ, तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ—

एक बुढ़िया की,

जो कभी लड़की थी,

और आज भी उसी शिद्दत से सपने बुनती है।”

मैंने अपने कान पहाड़ की शांत चोटियों से लगा दिए।

आँखें चट्टानों से सटा दीं।

और दूर घाटियों से शब्द उठने लगे—

कल्पना करो—

दूर, बहुत दूर,

सागर किनारे—

गोवा में—

एक धनी परिवार की एक सुंदर लड़की।

गोरा रंग, नाटा कद,

सुतवाँ नाक,

और साधारण होकर भी असाधारण आकर्षण वाली आँखें।

चंचल, शोख, कोमल।

नाम कुछ भी हो सकता है,

पर मैंने उसका नाम रखा—

स्नो व्हाइट।

स्नो व्हाइट—

पतली, दुबली,

कंधों पर लहराते घुँघराले बाल—बादलों जैसे।

आँखें—उफनते झरने।

वह सागर किनारे दौड़ती,

रेत पर घरौंदे बनाती,

सजाती, संवारती।

और तभी—

एक लहर आती,

घरौंदा बह जाता।

वह उदास होती।

फिर हँस देती।

और फिर उसी शिद्दत से

नया घरौंदा बनाने लगती।

उसे क्या पता—

एक किशोर दूर खड़ा उसे देख रहा है।

एक दिन वह पास आया—

“क्या मैं तुम्हारे साथ खेल सकता हूँ, स्नो?”

स्नो ने लटें पीछे कीं—

“हाँ, जॉन!”

और फिर—

रेत, लहरें, हँसी।

“तुम कितनी सुंदर हो,” जॉन ने कहा।

“परी जैसी।”

स्नो हँसी—

“मैं बिना पंखों की परी हूँ।

एक दिन उड़ जाऊँगी—चाँद पर।”

“तो मैं लहरों पर चलकर तुम तक पहुँच जाऊँगा।”

दोनों हँसे।

चाँद शरमा गया।

समय बीता।

जॉन बड़े जहाज़ पर सवार हुआ—

दूर… बहुत दूर चला गया।


स्नो—

रेत।

घरौंदा।

इंतज़ार।


मीलों लंबा इंतज़ार।


थककर वह हवाई जहाज़ में उड़ चली—

परिचारिका बनकर।

बादलों के पार झाँकती—

शायद जॉन दिख जाए।

पर हर बार निराशा ही हाथ लगी।

धीरे-धीरे

उसकी आँखों के सपने धुँधले पड़ गए।

पर मुस्कान बची रही।


फिर एक दिन—

एक राजकुमार उसकी ज़िंदगी में आया।

स्नो महल में रहने लगी।

कुछ दिन तक

सब स्वप्न-सा था।


फिर वही घरौंदा

पिंजरा बन गया।

राजकुमार व्यस्त था—

राजकाज में।

“तुम्हें किस बात की कमी है?”

वह कहता।


पर स्नो को कमी थी—

उन्मुक्त आकाश की।

लहरों की।

बादलों की।

एक दिन उसने अपने कटे पंख सँवारे

और फिर उड़ चली।

बादलों ने उसे गले लगाया।

वह हँसकर बोली—

“घरौंदे टूटते ही हैं।

गलती मेरी है—

मैं घर से ज़्यादा घरौंदे पसंद करती हूँ।”

पहाड़ चुप हो गया।


मैंने कहा—

“और इस तरह उसकी ज़िंदगी का दूसरा बौना भी चला गया।”

पहाड़ ने गहरी साँस ली।

अब स्नो—

मेरे ही पैरों तले

एक छोटा-सा सच्चा घर बनाकर रहती है।

घरौंदे नहीं बनाती अब।

घर बनाती है।

पर आज भी—

रात को तारों से बातें करती है।

बादलों से हँसती है।

और चाँद में

उसे जॉन दिख जाता है।


अब पहाड़ चुप है।

मैं भी चुप हूँ।

खिड़की खुली है।

गिलहरी पेड़ की खोह में जा चुकी है—

दाना-दुनका लेकर।


और पूरब में

सूरज ढल रहा है।


— मुकेश

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