होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 10 March 2026

भाग – 23 : कर्फ़्यू की रात और दरवाज़े की दस्तक

 लघु उपन्यास

भाग – 23 : कर्फ़्यू की रात और दरवाज़े की दस्तक

कर्फ़्यू का तीसरा दिन था।

शहर जैसे अपनी ही साँस सुन रहा था।
सड़क पर कभी-कभी पुलिस की जीप गुजर जाती
और फिर वही लंबा सन्नाटा लौट आता।

मैं खिड़की के पास बैठा था।
सिगरेट की डिब्बी सामने रखी थी।
अब उसमें बस चार सिगरेट बची थीं।

मैंने खुद से कहा—
“आज नहीं… शाम को पीऊँगा।”

कमरे का पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था।
झाड़ू दीवार के सहारे खड़ी थी
जैसे वह भी बाहर की खबर सुन रही हो।

आज कमरे की चीज़ें
बात नहीं कर रही थीं।

शायद दंगे का असर
निर्जीव चीज़ों पर भी पड़ता है।

नीचे गली में
मुर्गी वाले की छत दिखती थी।

पर आज मुर्गियाँ भी शांत थीं।
कभी-कभी कोई हल्की सी आवाज़ आती
और फिर सब चुप।

दूध वाला भी दो दिन से नहीं आया था।

मैंने सिगरेट की डिब्बी खोली
एक सिगरेट निकाली
और खिड़की के पास जाकर जलाई।

धुआँ ऊपर उठा
और उसी धुएँ में
सलोनी का चेहरा उभर आया।

ऐसे दिनों में
उसे बहुत याद करता हूँ।

वह हमेशा कहती थी—

“तुम्हारा कमरा बहुत उदास है।
इसे थोड़ा जीना सिखाओ।”

मैं मुस्कुरा देता था।

आज वही कमरा
मेरे साथ चुप बैठा था।

तभी अचानक
नीचे गली में किसी के भागने की आवाज़ आई।

फिर कुछ देर सन्नाटा।

और फिर—
मेरे दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई।

मैं ठिठक गया।

कर्फ़्यू की रात में
कौन हो सकता है?

दस्तक फिर हुई।

धीरे-धीरे।

मैंने दरवाज़े के पास जाकर पूछा—

“कौन?”

बाहर से काँपती आवाज़ आई—

“मैं हूँ…
मुर्गी वाला…”

मैंने जल्दी से कुंडी खोली।

वह दरवाज़े के सामने खड़ा था।
कपड़े धूल और पसीने से भीगे हुए थे।

उसकी आँखों में डर था
और हाथ थोड़ा काँप रहा था।

मैंने उसे अंदर आने को कहा।

वह कमरे में आया
और चारों ओर देखने लगा
जैसे पहली बार इस कमरे को देख रहा हो।

कुछ देर तक वह चुप बैठा रहा।

फिर बोला—

“भैया…
आज गली में झगड़ा हो गया था।
दो दुकानें जला दीं।
मैं मुर्गियाँ लेकर छत पर छुपा रहा।”

उसकी साँस अभी भी तेज़ चल रही थी।

मैंने उसे पानी दिया।

उसने लंबा घूँट लिया
और फिर धीरे से बोला—

“अजीब बात है भैया…
मुर्गियाँ भी डर गई थीं।
सब एक-दूसरे से चिपक कर बैठी थीं।”

कमरे में कुछ देर खामोशी रही।

फिर उसने दीवार पर टंगी घड़ी देखी
और अचानक हँस पड़ा।

मैंने पूछा—
“क्या हुआ?”

वह बोला—

“कुछ नहीं…
बस सोच रहा था…
हम लोग भी मुर्गियों जैसे ही हैं शायद।
जब डर लगता है
तो बस एक जगह छुप कर बैठ जाते हैं।”

उसकी हँसी में
थोड़ी थकान थी
थोड़ा दर्द।

मैंने सिगरेट जलाई
और उसे भी ऑफर की।

उसने मना कर दिया।

फिर बोला—

“भैया…
आप तो पढ़े लिखे आदमी हैं।
बताइए…
ये सब क्यों होता है?”

मैं कुछ देर चुप रहा।

मुझे अचानक
कामू की बात याद आई—

जीवन कभी-कभी बिना वजह भी क्रूर हो जाता है।

पर मैंने उसे किताबों की भाषा में जवाब नहीं दिया।

मैंने बस इतना कहा—

“शायद इसलिए…
क्योंकि लोग डर जाते हैं।”

वह सिर हिलाता रहा।

फिर बोला—

“डर तो सबको लगता है भैया…
पर कुछ लोग डर में आग क्यों लगा देते हैं?”

कमरे में फिर सन्नाटा फैल गया।

पंखा घूम रहा था।
सिगरेट का धुआँ धीरे-धीरे ऊपर जा रहा था।

और मुझे पहली बार लगा—

दर्शन किताबों में नहीं,
ऐसी ही रातों में पैदा होता होगा।

कुछ देर बाद
वह उठ खड़ा हुआ।

बोला—

“चलता हूँ भैया।
मुर्गियाँ अकेली होंगी।”

दरवाज़े तक पहुँच कर
वह अचानक रुका
और मेरी तरफ देखकर बोला—

“और हाँ…
अगर बहुत डर लगे ना…
तो मेरी छत पर आ जाना।
मुर्गियों के बीच बैठोगे
तो दिल थोड़ा हल्का हो जाएगा।”

वह चला गया।

गली फिर शांत हो गई।

मैंने दरवाज़ा बंद किया
और कमरे में लौट आया।

सिगरेट का आखिरी कश लिया।

और अचानक
सलोनी की याद
और गहरी हो गई।

मैंने सोचा—

अगर वह यहाँ होती
तो शायद इस कमरे में
थोड़ी रोशनी बढ़ जाती।

पंखा घूमता रहा।

कमरा चुप था।

और बाहर
कर्फ़्यू वाली रात
धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थी।

— मुकेश

No comments:

Post a Comment