लघु उपन्यास
भाग – 24 : इतिहास की किताब और मनुष्य का डर
कर्फ़्यू की रात धीरे-धीरे और भारी हो गई थी।
गली में अब कोई आवाज़ नहीं थी।
मुर्गी वाला जा चुका था।
कमरे में सिर्फ़ पंखे की धीमी आवाज़ रह गई थी।
मैंने मेज़ पर रखी किताब उठाई।
यह वही किताब थी
जिसे मैं इन दिनों पढ़ रहा था—
Sapiens: A Brief History of Humankind
इसके लेखक हैं
Yuval Noah Harari।
किताब खोलते ही
मुझे हमेशा एक अजीब-सी अनुभूति होती है—
जैसे कोई बहुत पुराना इतिहास
धीरे-धीरे मेरे सामने खुल रहा हो।
यह किताब सिर्फ़ इतिहास नहीं बताती,
यह मनुष्य को समझने की कोशिश करती है।
धर्म कैसे बना।
समाज कैसे बना।
पैसा और सत्ता कैसे पैदा हुए।
और विज्ञान ने मनुष्य को कहाँ पहुँचा दिया।
शायद यही कारण है
कि यह किताब दुनिया भर में इतनी प्रसिद्ध हुई।
क्योंकि इसमें
मानव सभ्यता को
एक बिल्कुल नई दृष्टि से देखा गया है।
मैं पन्ने पलट रहा था।
एक जगह लेखक लिखते हैं—
मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति
उसकी कल्पना है।
यही कल्पना
धर्म बनाती है,
राष्ट्र बनाती है,
कानून बनाती है।
मैं कुछ देर उस पंक्ति को देखता रहा।
फिर अचानक मुझे लगा—
शायद दंगे भी
किसी कल्पना से ही जन्म लेते होंगे।
एक कल्पना
कि दूसरा आदमी अलग है।
खतरनाक है।
दुश्मन है।
नीचे कहीं दूर
कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई।
मैंने किताब बंद कर दी।
और सोचने लगा
हज़ारों साल का इतिहास
इस कमरे में
एक किताब के रूप में रखा है।
और उसी इतिहास का
एक छोटा-सा टुकड़ा
आज इस शहर में
दंगे के रूप में घट रहा है।
मुझे अचानक
मुर्गी वाले की बात याद आई—
“हम लोग भी मुर्गियों जैसे ही हैं शायद।”
मैं मुस्कुरा दिया।
इतिहास की किताबें
कभी-कभी बहुत बड़ी बातें कहती हैं।
पर असली दर्शन
कभी-कभी
एक मुर्गी वाला भी बता देता है।
तभी अचानक
ऊपर की मंज़िल से
किसी के चलने की आवाज़ आई।
यह अजीब था।
क्योंकि मकान मालिक
आमतौर पर रात में नीचे नहीं आते थे।
मैंने घड़ी देखी
रात के साढ़े बारह।
फिर सीढ़ियों से
धीरे-धीरे उतरते कदमों की आवाज़ आई।
और कुछ ही क्षण बाद
मेरे दरवाज़े पर
एक और दस्तक हुई।
यह दस्तक
पहली वाली से अलग थी।
थोड़ी भारी।
थोड़ी संकोची।
मैंने दरवाज़ा खोला।
सामने
मकान मालिक खड़े थे।
उनके हाथ में
एक पुरानी डायरी थी।
उन्होंने मुझे देखा
और धीमे स्वर में कहा
“माफ़ करना…
इतनी रात को परेशान कर रहा हूँ।”
मैंने कहा
“नहीं… आइए।”
वह कमरे में आए
और कुर्सी पर बैठ गए।
कुछ देर तक
वह कमरे को देखते रहे।
फिर अचानक बोले—
“तुम किताबें बहुत पढ़ते हो ना?”
मैंने मेज़ की तरफ देखा।
ऊपर वही किताब रखी थी—
Sapiens।
उन्होंने किताब उठाई
और उसके कवर को कुछ देर देखते रहे।
फिर धीरे से बोले
“इतिहास पढ़ना अच्छा है…
पर कभी-कभी
इतिहास आदमी को दुखी भी कर देता है।”
मैं चुप रहा।
फिर उन्होंने अपनी डायरी खोली।
उसमें से
एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर को कुछ क्षण देखते रहे।
और फिर मेरी तरफ बढ़ा दी।
मैंने तस्वीर हाथ में ली।
और अगले ही क्षण
मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा।
क्योंकि उस तस्वीर में
दो लोग खड़े थे
एक
जवानी के दिनों के मकान मालिक।
और दूसरी…
सलोनी।
कमरे में
अचानक एक गहरी खामोशी फैल गई।
मकान मालिक धीरे से बोले—
“तुम उसे जानते हो ना…”
मैंने उनकी तरफ देखा।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
“सलोनी…
कभी इस घर में रहती थी।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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