लघु उपन्यास
भाग – 27 : शहर का धीरे-धीरे लौटना
आज सुबह
कई दिनों बाद
मुझे लगा कि शहर की साँस थोड़ी सामान्य हो रही है।
कर्फ़्यू लगभग हट चुका है।
गली में अब
सिर्फ़ पुलिस के बूटों की आवाज़ नहीं आती।
कभी-कभी
किसी साइकिल की घंटी भी सुनाई दे जाती है।
सुबह जब खिड़की खोली
तो दूर कहीं से
गायों के रंभाने की आवाज़ आ रही थी।
कई दिनों बाद
यह आवाज़ सुनाई दी।
जैसे शहर धीरे-धीरे
अपने पुराने स्वर में लौट रहा हो।
गली के मोड़ पर
गुमटी वाला बाबा फिर से चाय बना रहा था।
एल्यूमिनियम की केतली से
भाप उठ रही थी।
दो पुलिस वाले
अब भी वहीं खड़े थे
पर उनके चेहरों पर
पहले जैसी कठोरता नहीं थी।
आज सुबह
दूध वाला भी आया।
पहले की तरह
चुपके से नहीं।
इस बार उसने
दरवाज़ा खटखटाया।
मैंने दरवाज़ा खोला।
उसके हाथ में
दूध का वही पुराना डिब्बा था।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“लगता है बाबूजी
अब शहर धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा।”
मैंने दूध का बर्तन लिया
और उसे अंदर आने को कहा।
वह दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा।
फिर धीरे-धीरे
शहर की बातें बताने लगा।
कहाँ-कहाँ आग लगी थी।
कौन-सी दुकानें जल गईं।
कौन-कौन से मोहल्ले
कई रातों तक जागते रहे।
उसकी आवाज़ में
थकान भी थी
और राहत भी।
मैं चुपचाप सुनता रहा।
सच कहूँ तो
मुझे शहर की आधी बातें
उसी से पता चलती हैं।
क्योंकि
मैं न अख़बार पढ़ता हूँ
और न मोबाइल ज़्यादा देखता हूँ।
दूध वाले ने जाते-जाते कहा—
“दो दिन बाद स्कूल भी खुल जाएँगे।”
यह सुनकर
मुझे अचानक अच्छा लगा।
स्कूल का खुलना
हमेशा शहर के ठीक होने का संकेत होता है।
बच्चों की आवाज़
किसी भी शहर की
सबसे सच्ची मरम्मत होती है।
दूध वाला चला गया।
मैं खिड़की के पास खड़ा रहा।
गली में अब
दो-तीन लोग धीरे-धीरे चल रहे थे।
एक बच्चा
टूटी हुई गेंद लेकर खेल रहा था।
शांति पगलिया भी दिखी।
आज वह
हँस नहीं रही थी।
बस चुपचाप
गली के किनारे बैठी थी
और अपने बालों को सुलझाने की कोशिश कर रही थी।
गुमटी वाले की चाय की भाप
धीरे-धीरे हवा में उठ रही थी।
कमरे में लौटकर
मैंने चारों तरफ देखा।
चाय का पैन
आज भी गैस स्टोव पर रखा था।
सिगरेट की डिब्बी
अब भी मेज़ पर थी।
तख़्त पर किताबें
वैसे ही फैली हुई थीं।
पर कमरे की हवा
आज कुछ हल्की लग रही थी।
जैसे उसे भी पता चल गया हो
कि बाहर का शहर
अब थोड़ा शांत है।
मैंने खिड़की से एक बार फिर बाहर देखा।
और अचानक
मुझे याद आया—
मुर्गी वाला अभी तक नहीं लौटा।
उसकी छत आज भी खाली है।
मुर्गियों की वह धीमी-सी कुट-कुट
कई दिनों से नहीं सुनी।
शायद वह कहीं और चला गया।
या शायद
अभी लौटने की हिम्मत नहीं हुई।
शहर जब टूटता है
तो सिर्फ़ दीवारें नहीं टूटतीं।
कई लोग भी
अपने भीतर से टूट जाते हैं।
मैं कुर्सी पर बैठ गया।
कुछ देर तक
बस गली को देखता रहा।
दूध वाले की बातें
धीरे-धीरे मन में घूमती रहीं।
और मैंने सोचा—
मैं अख़बार नहीं पढ़ता।
मोबाइल भी बहुत कम देखता हूँ।
शायद इसलिए
मैं शहर को
समाचारों से नहीं
लोगों से समझता हूँ।
दूध वाले से।
गुमटी वाले से।
मुर्गी वाले से।
और शायद
इसी तरह
शहर धीरे-धीरे समझ में आता है।
पंखा घूमता रहा।
टेबल लैम्प अब भी मेज़ पर रखा था।
और कमरा
आज पहली बार
थोड़ा शांत
थोड़ा संतुष्ट
लग रहा था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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