लघु उपन्यास : भाग – 3 - अध्याय 1 अस्तित्व और साक्षी : भीड़ में एक आवाज़
तीन महीने बीत चुके थे।
समय का यह अंतराल बहुत लंबा भी नहीं था और इतना छोटा भी नहीं कि स्मृतियाँ अपना असर खो दें।
अस्तित्व के जीवन में इन तीन महीनों में बाहर से बहुत कुछ नहीं बदला था, पर भीतर कुछ धीमे-धीमे बदल रहा था जैसे किसी नदी का बहाव सतह पर शांत हो पर भीतर कहीं गहराई में उसकी दिशा बदल रही हो।
उस दिन वह एक बड़े शहर के पुस्तक मेले में था।
चारों तरफ़ किताबों की दुकानों की कतारें थीं।
काग़ज़ और स्याही की मिली-जुली गंध हवा में तैर रही थी।
लोग किताबों के पन्ने उलट रहे थे, लेखक मंचों पर बोल रहे थे, और युवा पाठक अपने पसंदीदा लेखकों के हस्ताक्षर लेने के लिए पंक्तियों में खड़े थे।
अस्तित्व भीड़ के बीच धीरे-धीरे चल रहा था।
किताबों से उसका पुराना रिश्ता था—
सिर्फ़ पाठक का नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का जो किताबों के माध्यम से जीवन के प्रश्नों को समझने की कोशिश करता है।
पिछले कुछ वर्षों में उसके व्याख्यान भी होने लगे थे।
लोग उसे सुनने आते थे क्योंकि वह जीवन के बारे में किसी गुरु की तरह नहीं, बल्कि एक खोजी की तरह बोलता था।
आज भी उसे शाम को एक छोटे से मंच पर बोलना था।
विषय था
“मनुष्य और उसका साक्षी।”
वह हल्का-सा मुस्कराया।
कभी-कभी उसे लगता था कि जीवन भी कितना अजीब है।
जिन बातों को हम विचारों में समझते हैं, वही बातें अचानक हमारे जीवन की घटनाएँ बनकर सामने खड़ी हो जाती हैं।
उसने एक स्टॉल पर रुककर एक किताब उठाई।
किताब का शीर्षक था
“स्मृति और वर्तमान का संबंध।”
वह पन्ने पलट ही रहा था कि अचानक उसे लगा जैसे समय कुछ क्षणों के लिए रुक गया है।
भीड़ का शोर वहीं था,
लोग चलते हुए भी दिख रहे थे,
पर उसके भीतर किसी ने जैसे एक अदृश्य घंटी बजा दी हो।
तभी पीछे से एक धीमी आवाज़ आई—
“अस्तित्व…”
आवाज़ बहुत ऊँची नहीं थी।
पर उसमें एक अजीब पहचान थी
जैसे किसी पुराने गीत की धुन अचानक कहीं दूर से सुनाई दे जाए।
अस्तित्व धीरे-धीरे मुड़ा।
भीड़ के बीच खड़ी एक स्त्री उसे देख रही थी।
कुछ क्षण तक दोनों के बीच कोई शब्द नहीं था।
समय जैसे अपने आप को समेटकर उस छोटे से क्षण में आकर ठहर गया था।
वह साक्षी थी।
पर वह वैसी नहीं थी जैसी उसकी स्मृतियों में थी।
चेहरे पर वही शांत प्रकाश था,
पर अब उसमें जीवन के अनुभवों की एक हल्की गहराई भी थी।
आँखों में वही सहजता थी,
पर उनके पीछे जैसे कुछ अनकही यात्राएँ भी थीं।
अस्तित्व के भीतर एक अजीब-सा भाव उठा
न पूरी खुशी,
न पूरी विस्मय।
बस एक शांत-सी स्वीकृति।
जैसे किसी लंबे प्रश्न का उत्तर अचानक सामने खड़ा हो जाए।
कुछ क्षण बाद साक्षी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“लगता है तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा कि मैं सचमुच यहाँ हूँ।”
अस्तित्व भी मुस्करा दिया।
“विश्वास तो हो रहा है…
पर यह भी लग रहा है कि शायद यह भी किसी किताब का एक पन्ना है।”
दोनों हल्के से हँस पड़े।
भीड़ उनके आसपास अब भी उसी तरह चल रही थी।
किसी को यह पता नहीं था कि उस भीड़ के बीच दो लोग ऐसे मिल रहे हैं जिनके बीच केवल परिचय नहीं, बल्कि कई प्रश्न, कई संवाद और कई अधूरी यात्राएँ भी हैं।
साक्षी ने धीरे से कहा
“मैं तुम्हारा व्याख्यान सुनने आई हूँ।”
अस्तित्व ने आश्चर्य से पूछा
“तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ?”
साक्षी ने कुछ क्षण उसे देखा।
“कुछ बातें पता नहीं चलतीं…
बस महसूस हो जाती हैं।”
अस्तित्व ने जवाब में कुछ नहीं कहा।
कभी-कभी शब्द सचमुच अनावश्यक हो जाते हैं।
तभी सामने से एक परिचित आवाज़ आई
“अरे अस्तित्व जी, आप यहाँ हैं!”
वह मुड़ा।
वह नील था, पुराना मित्र,
जिसके साथ अस्तित्व ने जीवन के कई गंभीर और हल्के संवाद किए थे।
नील पास आ गया और मुस्कराते हुए बोला
“मैं आपको पूरे मेले में ढूँढ़ रहा था।
आपका सत्र आधे घंटे में शुरू होने वाला है।”
फिर उसकी नज़र साक्षी पर गई।
“ओह… शायद मैं बीच में आ गया।”
अस्तित्व ने सहजता से कहा
“नहीं नील, मिलो…
ये साक्षी हैं।”
नील ने हल्का-सा सिर झुकाया।
“नाम तो बहुत सुना है।”
साक्षी ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया
“उम्मीद है सब अच्छा ही सुना होगा।”
तीनों के बीच एक क्षण के लिए हल्की-सी हँसी फैल गई।
पर उस हँसी के भीतर भी एक अदृश्य प्रश्न मौजूद था—
क्या यह मुलाक़ात केवल एक संयोग है?
या जीवन अब कोई नया अध्याय खोलने वाला है?
अस्तित्व ने मेले की भीड़ की ओर देखा।
कभी-कभी जीवन भी एक पुस्तक मेले जैसा होता है—
जहाँ हजारों किताबों के बीच
अचानक एक ऐसी कहानी सामने आ जाती है
जिसे पढ़ने के लिए हम वर्षों से तैयार हो रहे होते हैं।
और शायद…
उस कहानी का पहला पन्ना
अभी-अभी खुला था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment