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Saturday, 14 March 2026

लघु उपन्यास : भाग – 3 :अध्याय 2 अस्तित्व और साक्षी : प्रश्न जो भीतर उतर गया

 लघु उपन्यास : भाग – 3 :अध्याय 2  अस्तित्व और साक्षी : प्रश्न जो भीतर उतर गया

शाम का समय था।

पुस्तक मेले के उस छोटे से सभागार में लगभग सौ–डेढ़ सौ लोग बैठे थे।

मंच पर एक साधारण-सी मेज़, एक कुर्सी और पीछे सफ़ेद कपड़े का परदा था।

अस्तित्व मंच पर बैठा था।

उसके सामने बैठे लोगों के चेहरों में उत्सुकता थी।

कुछ युवा थे, कुछ उम्रदराज़, कुछ ऐसे भी जो शायद सिर्फ़ संयोग से वहाँ आ बैठे थे।

पहली पंक्ति में साक्षी बैठी थी।

उसका चेहरा शांत था, पर उसकी आँखों में एक गहरी सजगता थी

जैसे वह केवल शब्द नहीं, बल्कि शब्दों के पीछे की चुप्पी भी सुन रही हो।

अस्तित्व ने बोलना शुरू किया।

“मनुष्य अपने जीवन में दो तरह से जीता है।

एक वह जो सबको दिखाई देता है—हमारा काम, हमारे संबंध, हमारे निर्णय।

और दूसरा वह जो किसी को दिखाई नहीं देता

वह जो भीतर चुपचाप सब कुछ देख रहा होता है।”

सभागार में हल्की-सी खामोशी फैल गई।

“उसी को मैं ‘साक्षी’ कहता हूँ।

वह हमारे भीतर बैठा हुआ वह मौन बिंदु है

जो हमारे दुख को भी देखता है

और हमारी खुशियों को भी।”

अस्तित्व थोड़ी देर रुका।

उसे अचानक लगा जैसे उसके अपने ही शब्द कहीं भीतर लौट रहे हों।

उसने अनायास पहली पंक्ति की ओर देखा।

साक्षी की आँखें उस पर टिकी थीं।

पर उस क्षण उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई

जैसे वह केवल उसे नहीं देख रही,

बल्कि उसके भीतर कुछ और भी देख रही हो।

अस्तित्व ने बात आगे बढ़ाई।

“हम जीवन भर बाहर लोगों को खोजते रहते हैं

मित्र, प्रेम, सहारा।

पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति हमारे जीवन में आकर

हमें हमारे ही भीतर से मिला देता है।”

सभागार में बैठे लोगों के चेहरों पर हल्की-सी जिज्ञासा थी।

व्याख्यान लगभग एक घंटे चला।

जब समाप्त हुआ तो संचालक ने कहा

“अब यदि किसी को प्रश्न पूछना हो तो पूछ सकता है।”

कुछ क्षण तक कोई हाथ नहीं उठा।

फिर धीरे से साक्षी खड़ी हुई।

सभागार में हल्की-सी सरसराहट हुई।

उसने बहुत शांत स्वर में पूछा

“अगर कोई व्यक्ति हमारे जीवन में बार-बार इस तरह आए

जैसे वह हमें हमसे ही मिलाने आया हो…

तो क्या वह सचमुच एक व्यक्ति है?

या वह हमारे भीतर की किसी अधूरी चेतना का रूप हो सकता है?”

प्रश्न साधारण नहीं था।

सभागार में बैठे कई लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

अस्तित्व कुछ क्षण चुप रहा।

उसे लगा जैसे यह प्रश्न केवल एक श्रोता का नहीं है—

यह प्रश्न सीधे उसके अपने भीतर से उठ रहा है।

उसने धीरे से कहा

“कभी-कभी जीवन में कुछ लोग ऐसे आते हैं

जो केवल व्यक्ति नहीं होते।

वे हमारे भीतर छिपे हुए किसी हिस्से को जगाने आते हैं।

उनके आने से हमें लगता है

कि हम किसी दूसरे से नहीं,

बल्कि अपने ही किसी गहरे रूप से मिल रहे हैं।”

साक्षी ने अगला प्रश्न पूछा

“और अगर ऐसा हो कि उस व्यक्ति को खो देने का डर न हो…

क्योंकि भीतर कहीं यह विश्वास हो

कि वह कभी सच में खो नहीं सकता?”

अब सभागार पूरी तरह शांत था।

अस्तित्व ने पहली बार महसूस किया कि उसके अपने शब्द भी

अब उतने स्पष्ट नहीं रह गए थे।

उसने धीरे-धीरे कहा

“शायद तब वह व्यक्ति हमारे जीवन में एक दर्पण बन जाता है।

एक ऐसा दर्पण

जिसमें हम पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप को देखते हैं।”

साक्षी कुछ क्षण चुप रही।

फिर उसने केवल इतना कहा

“तो क्या यह संभव है कि

हम किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं,

बल्कि अपनी ही चेतना से प्रेम करने लगें?”

यह प्रश्न सुनते ही सभागार में बैठे कई लोगों के चेहरे बदल गए।

किसी ने हल्की मुस्कान से देखा,

किसी ने आश्चर्य से।

अस्तित्व के भीतर जैसे कोई पुरानी स्मृति हिल गई।

उसे अचानक वह पहला दिन याद आया

जब उसने साक्षी से बात की थी।

तब भी उसे लगा था कि यह संवाद सामान्य नहीं है।

अब उसे एक नया विचार छू रहा था

क्या यह संभव है कि साक्षी केवल एक स्त्री नहीं…

बल्कि उसके अपने ही मन की वह आवाज़ हो

जिसे वह वर्षों से सुनना चाहता था?

पर अगले ही क्षण उसने खुद को संभाला।

उसने शांत स्वर में उत्तर दिया

“प्रेम कभी केवल बाहर नहीं होता।

वह हमेशा भीतर से शुरू होता है।

हम किसी दूसरे में वही पहचानते हैं

जो कहीं न कहीं हमारे भीतर पहले से मौजूद होता है।”

साक्षी ने कोई और प्रश्न नहीं पूछा।

वह चुपचाप बैठ गई।

व्याख्यान समाप्त हो गया।

लोग धीरे-धीरे सभागार से बाहर जाने लगे।

नील पास आया और मुस्कराते हुए बोला

“अस्तित्व, आज तो आपके व्याख्यान से ज़्यादा दिलचस्प तो प्रश्न थे।”

अस्तित्व हल्के से मुस्कराया।

पर उसके भीतर एक नया विचार धीरे-धीरे आकार ले रहा था—

क्या साक्षी सचमुच केवल एक व्यक्ति है?

या वह उसके भीतर छिपी उस चेतना की आवाज़ है

जो वर्षों से उसे पुकार रही थी?

सभागार के बाहर शाम उतर रही थी।

लोगों की भीड़ फिर से मेले की रोशनी में घुल रही थी।

अस्तित्व बाहर निकला।

साक्षी थोड़ी दूर खड़ी थी।

वह उसे देख रही थी

ठीक वैसे ही

जैसे कोई दर्पण

किसी चेहरे को देखता है।

और उस क्षण

अस्तित्व को पहली बार लगा

शायद इस कहानी की यात्रा

दो लोगों की नहीं है।

यह एक मनुष्य की

अपने ही भीतर की ओर

लौटने की यात्रा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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