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Wednesday, 4 March 2026

वह गीत बरगद के लिए नहीं था

वह गीत बरगद के लिए नहीं था

इलाहाबाद की गलियों में

वह चुप रहने वाली स्त्री

किसी और पुरुष के

एकतरफ़ा प्रेम में थी


वह प्रेम

ज़मीन का नहीं था

उसे उड़ना था


वह चिड़िया बनना चाहती थी

अपने मनपसंद चिड़े के साथ

आसमान को

आदत बनाना चाहती थी


पर हर उड़ान

संभव नहीं होती

और हर चिड़ा

साथ नहीं उड़ता


निराश होकर

वह स्त्री

अक्सर

एक बरगद की डाल पर

आ बैठती


बरगद

उसकी थकन समझता था

पर प्रश्न नहीं करता

उसकी छाया

बिना माँगे

दे देता


वह स्त्री

उस डाल पर बैठकर

गीत गाती थी


गीत

उड़ान के थे

आसमान के थे

जोड़ी में पंख फड़फड़ाने के थे


वह गीत

बरगद के लिए नहीं थे


बरगद

जानता था

कि गीत

किसी और चिड़े के नाम हैं


फिर भी

वह हिलता नहीं

हवा को भी

धीमे चलने को कहता


कभी-कभी

स्त्री के स्वर में

दरार आ जाती


और पत्तों के बीच

एक सन्नाटा

उतर आता


बरगद

उसे थामे रहता

बिना उम्मीद के


इलाहाबाद की गलियों ने देखा

कुछ पेड़

आसरा होते हैं

मंज़िल नहीं


और कुछ प्रेम

गीत सुनते हैं

अपना नाम

न जानकर भी


वह स्त्री

उड़ना चाहती थी


और वह पुरुष

बरगद होकर

उसे

गिरने से बचाता रहा।


मुकेश ,,,,,,,

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