उसने सुन तो लिया
एक पुराने शहर में, इलाहाबाद में
बरगद होने से पहले
वह पुरुष
फिर एक बार
मनुष्य था
इलाहाबाद की गलियों में
एक चुप रहने वाली स्त्री रहती थी
साइकिल नहीं
शब्द चलाती हुई
पर धीरे
इतने धीरे
कि आवाज़ अर्थ से पहले थक जाए
वह पुरुष
उससे प्रेम कर बैठा
अचानक नहीं
धीरे-धीरे
जैसे कोई
अपने ही भीतर
दरवाज़ा ढूँढ ले
उसके पास
कहने के लिए बहुत कुछ था
अपने बारे में
पहली बार
वह बोलने लगा
और वह स्त्री
सुनती रही
सुनना और उत्सुक होना
एक बात नहीं होती
यह वह पुरुष
देर से समझा
स्त्री ने
कोई प्रश्न नहीं किया
किसी वाक्य को
रोक कर नहीं रखा
उसकी चुप्पी
गहरी थी
पर प्रतीक्षारत नहीं
वह पुरुष
अपने बारे में बोलता रहा
जैसे बरसों की नदी
अचानक
मुखर हो गई हो
और वह स्त्री
सुनती रही
पर
सुनने के लिए
रुकी नहीं
उस दिन
पुरुष ने जाना—
कुछ प्रेम
साक्षी माँगते हैं
सहभाग नहीं
कुछ कान
आवाज़ तक आते हैं
अर्थ तक नहीं
एक दिन
वह पुरुष
फिर से चुप हो गया
और चुप्पी के भीतर
धीरे-धीरे
बरगद बनता चला गया
उसकी टहनियों में
लटके रह गए
अधूरे वाक्य
और जड़ों में
दबी रह गई
पहली स्वीकारोक्ति
इलाहाबाद की गलियों ने देखा
अब वह बोलता नहीं
बस
छाया देता है
और वह चुप रहने वाली स्त्री
कभी-कभी
उस बरगद के पास से गुज़रती है
वह रुकती नहीं
पर
सुन लेती है
और बरगद
समझ जाता है
कुछ प्रेम
कहे जाने के लिए नहीं
बस
हो जाने के लिए होते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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