सत्ता, सत्य और मनुष्य का संघर्ष
सभ्यता के आरम्भ से
एक त्रिकोण खड़ा है
सत्ता, सत्य
और मनुष्य।
सत्ता
व्यवस्था की शक्ति है,
संगठन की रीढ़,
भीड़ को दिशा देने वाला
एक केंद्र।
पर सत्य—
किसी सिंहासन का
अनुचर नहीं होता।
वह
अक्सर राजमहलों से बाहर
किसी साधु की झोपड़ी में,
किसी कवि की पंक्ति में
या
किसी विद्रोही की आवाज़ में
जन्म लेता है।
इतिहास गवाह है
सत्ता को
स्थिरता चाहिए,
और सत्य को
स्वतंत्रता।
इसीलिए
दोनों का संबंध
हमेशा सहज नहीं रहा।
जब सत्ता
अपने अस्तित्व के लिए
सत्य को सीमित करती है,
तो संघर्ष जन्म लेता है।
और जब मनुष्य
सत्य की ओर खड़ा हो जाता है,
तो वही संघर्ष
इतिहास बन जाता है।
मनुष्य
इन दोनों के बीच
सबसे कठिन स्थिति में है।
क्योंकि
सत्ता उसे सुरक्षा देती है,
और सत्य
उसे जागृति।
सुरक्षा में
वह सहज रहता है,
पर जागृति
उसे प्रश्न करने को कहती है।
यहीं
मनुष्य की असली परीक्षा है
कि वह
सत्ता के भय से चुप रहे
या
सत्य की रोशनी में
अपनी आवाज़ खोजे।
दर्शन कहता है
सत्ता का जीवन
समय से बँधा है,
पर सत्य का अस्तित्व
समय से परे है।
इसीलिए
साम्राज्य गिर जाते हैं,
सिंहासन बदल जाते हैं,
पर सत्य
फिर किसी नए मनुष्य के भीतर
जाग उठता है।
और तब
इतिहास एक बार फिर लिखता है
कि मनुष्य का
सबसे बड़ा संघर्ष
दूसरों से नहीं,
सत्ता और सत्य के बीच
अपने स्थान को पहचानने का है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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