युद्ध और शांति — मनुष्य की द्वंद्वगाथा
इतिहास की धूल में
सबसे अधिक जो शब्द मिला है
वह “युद्ध” है।
और सबसे अधिक
जिसकी तलाश रही है
वह “शांति”।
मनुष्य ने
पत्थर के पहले औज़ार से लेकर
नाभिकीय अग्नि तक
हथियार बनाए,
पर हर हथियार के पीछे
एक भय था —
और हर भय के भीतर
एक अधूरी शांति।
राजाओं के समय
घोड़ों की टापों में युद्ध था,
तोपों के धुएँ में साम्राज्य थे,
और आज
उपग्रहों की आँखों में
रणनीति का ठंडा गणित है।
पर शोध बताता है —
युद्ध केवल मैदान में नहीं होता,
वह मनुष्य के भीतर भी चलता है।
अहंकार और करुणा के बीच,
भय और विश्वास के बीच,
स्वामित्व और समर्पण के बीच
एक अदृश्य कुरुक्षेत्र है।
जब मन
“मैं” की सीमा खींचता है
तो युद्ध जन्म लेता है,
और जब चेतना
सीमाओं को भंग कर देती है
तो शांति प्रकट होती है।
इतिहास की पुस्तकें कहती हैं —
युद्ध से साम्राज्य बनते हैं,
पर दर्शन कहता है —
युद्ध से केवल
खण्डहर बचते हैं।
शांति
कोई संधि-पत्र नहीं,
न ही पराजय की थकी हुई स्वीकृति है।
शांति
एक आन्तरिक विज्ञान है,
जहाँ
क्रोध की ऊर्जा
करुणा में परिवर्तित होती है,
और शक्ति
संरक्षण बन जाती है।
जब मनुष्य
अपने भीतर के शस्त्र रख देता है,
तभी बाहर की तलवारें
जंग खाने लगती हैं।
और तब
इतिहास पहली बार लिखता है
कि पृथ्वी पर
सबसे कठिन विजय
दूसरे पर नहीं,
अपने भीतर के युद्ध पर होती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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