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Sunday, 15 March 2026

व्हेल की साँस और तुम्हारी ख़ामोशी

 व्हेल की साँस और तुम्हारी ख़ामोशी


समुंदर आज

कुछ ज़्यादा ही गहरा लग रहा था,

जैसे उसकी छाती में

कोई पुरानी कहानी

धीरे–धीरे धड़क रही हो।


लहरें उन्मुक्त थीं

मगर उनकी हँसी में भी

एक अजीब-सी थकान थी,

वे आतीं, किनारे को छूतीं

और फिर चुपचाप लौट जातीं।


रेत पर फैला

सफ़ेद, मटमैला, फेनिल झाग

ऐसा था

जैसे किसी अधूरी बात का

टूटता हुआ वाक्य।


दूर एक मछुआरा

अपनी छोटी-सी नाव में

समुंदर की लय के साथ झूल रहा था,

उसके जाल से ज़्यादा

उसकी आँखें

पानी की गहराई में उतर रही थीं।


तभी

समुंदर की नीलिमा फटती-सी लगी,

और एक विशाल व्हेल

धीरे-धीरे ऊपर आई।


उसकी साँस

नमकीन हवा में घुल गई

एक लंबी, गहरी, थकी हुई साँस,

जैसे सदियों का सफ़र

एक पल में बाहर आ गया हो।


लहरें उसके इर्द–गिर्द

धीरे-धीरे घूमने लगीं,

मानो समुंदर

उसे अपने आँचल में

फिर से सुला देना चाहता हो।


और उसी क्षण

मुझे तुम्हारी याद आई।


तुम्हारी वह ख़ामोशी

जो कभी शब्द नहीं बनती,

मगर दिल में

बहुत कुछ कह जाती है।


व्हेल की साँस में

जो गहराई थी,

वही गहराई

तुम्हारी ख़ामोशी में भी है।


दोनों में

एक ही बात छुपी है

बहुत दूर से आई हुई

बहुत पुरानी थकान।


और मैं सोचता हूँ

समुंदर जितना भी विशाल हो,

उसकी गहराइयों में

जितने भी रहस्य हों,


उन सबके बीच

सबसे रहस्यमयी चीज़

शायद यही है


व्हेल की एक लंबी साँस

और तुम्हारी एक लंबी

ख़ामोशी।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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