किताब : मनुष्य की दूसरी स्मृति
१. प्रस्तावना
कहा जाता है
मनुष्य यादों से बना है।
पर यह पूरी सच्चाई नहीं।
मनुष्य
दो स्मृतियों से बना है
एक
जो उसके भीतर रहती है
और दूसरी
जो किताबों में सोती है।
२. खोज
जब पहली बार
किसी मनुष्य ने
पत्थर पर एक चिन्ह बनाया होगा
वह कविता नहीं थी
वह स्मृति को
मृत्यु से बचाने की कोशिश थी।
यहीं से
किताब का जन्म हुआ
धीरे-धीरे
मिट्टी की तख्तियों से
ताड़पत्रों तक
और ताड़पत्रों से
काग़ज़ तक।
किताबें
दरअसल
मनुष्य की स्मृति का
लंबा प्रवास हैं।
३. प्रयोग
एक रात
मैंने एक किताब को
वैज्ञानिक की तरह पढ़ा।
मैंने देखा
हर पन्ना
एक प्रयोग है
हर वाक्य
एक निष्कर्ष
और हर लेखक
समय के साथ
संवाद करता हुआ
एक शोधकर्ता।
किताबें
दरअसल
विचारों की प्रयोगशाला हैं
जहाँ
सभ्यताएँ
अपनी असफलताओं और सफलताओं
दोनों को
संभाल कर रखती हैं।
४. उपयोगिता
अगर किताबें न होतीं
तो मनुष्य
हर पीढ़ी में
फिर से आदिम हो जाता।
हर बार
आग फिर खोजनी पड़ती
पहिया फिर बनाना पड़ता
और सत्य
फिर से पहचानना पड़ता।
किताबें
समय को बचाती हैं।
वे
मनुष्य की भूलों को
इतिहास बना देती हैं
और उसके सपनों को
भविष्य।
५. एक अदृश्य चमत्कार
किताबें
अजीब चीज़ हैं
वे
मृत लोगों को
जीवित रखती हैं।
कभी
एक दार्शनिक
सदियों बाद
किसी छात्र से बात करता है
कभी
एक कवि
किसी अनजान दिल में
अचानक रोशनी जला देता है।
यह
समय के पार
चलने वाला
सबसे शांत संवाद है।
६. निष्कर्ष
शायद इसलिए
किताबें
सिर्फ वस्तु नहीं हैं।
वे
मनुष्य की चेतना का
विस्तार हैं।
जब भी
कोई किताब खुलती है
दुनिया
थोड़ी और गहरी हो जाती है
और मनुष्य
थोड़ा कम अकेला।
मुकेश ,,
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