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Thursday, 5 March 2026

प्रकाश की उत्पत्ति-कथा

 प्रकाश की उत्पत्ति-कथा


आरंभ में

अंधकार नहीं था

अंधकार का भी नाम नहीं था।

सिर्फ़ ऊर्जा का असह्य घनत्व,

जहाँ स्थान और समय

एक ही बिंदु की चुप्पी में थे।


फिर विस्तार हुआ

अचानक, तीव्र, अनंत की ओर।

उष्मा घटती गई,

कण बने,

प्रतिपदार्थ से संवाद हुआ,

और संतुलन की एक सूक्ष्म चूक ने

पदार्थ को थोड़ा-सा अधिक रहने दिया।


उसी अतिरिक्त अंश में

भविष्य छिपा था।


जब ब्रह्मांड कुछ मिनटों का हुआ,

हाइड्रोजन और हीलियम की रचना हुई

पर प्रकाश तब भी मुक्त नहीं था।

वह प्लाज़्मा के घने कोहरे में

बार-बार बिखरता,

दिशा खोता।


तीन लाख अस्सी हज़ार वर्षों बाद

ताप इतना घटा

कि इलेक्ट्रॉन

नाभिक से जुड़ सके।

परमाणु बने,

और प्रकाश—

पहली बार

स्वतंत्र हुआ।


वही आदिम चमक

आज भी पृष्ठभूमि में

मद्धिम तरंगों की तरह उपस्थित है

ब्रह्मांड का शैशव-चित्र।


फिर निहारिकाएँ सघन हुईं,

पहले तारे जले।

नाभिकीय संलयन ने

अंधकार के विरुद्ध

स्थायी दीप प्रज्वलित किए।


प्रकाश अब केवल स्मृति नहीं रहा—

वह दिशा बन गया।

तारों से ग्रहों तक,

ग्रहों से आँखों तक,

आँखों से चेतना तक।


हम जो देखते हैं,

वह प्रकाश का इतिहास है—

किसी दूर तारे से चला

और हमारी पुतलियों में आकर

अपना अर्थ पाया।


प्रकाश की उत्पत्ति-कथा

सिर्फ़ भौतिक घटना नहीं

यह अनावरण की कथा है।

ऊर्जा से दृष्टि तक,

कण से अनुभूति तक।


और आज भी

हर नया तारा

उस आदिम कथा का

एक नया वाक्य लिखता है।


प्रकाश

अंधकार का विरोध नहीं

उसकी संभावित व्याख्या है।


मुकेश ,,,,,,

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