लौटकर आने वाली ख़ामोशी
दिन भर
दुनिया बोलती रहती है
सड़कों का शोर,
लोगों की आवाज़ें,
और विचारों की
लगातार चलती हुई हलचल।
पर रात के किसी क्षण
सब थम जाता है,
और तब
एक पुरानी ख़ामोशी
धीरे-धीरे लौट आती है।
वह दरवाज़ा नहीं खटखटाती,
बस कमरे के किसी कोने में
चुपचाप बैठ जाती है,
जैसे उसे पता हो
कि यह घर
कभी उसी का था।
उसकी उपस्थिति में
घड़ी की टिक-टिक भी
कुछ अलग सुनाई देती है,
और मन
अपने ही भीतर
धीरे-धीरे उतरने लगता है।
तब महसूस होता है—
कि ख़ामोशी
खालीपन नहीं होती,
वह तो
एक गहरी जगह है
जहाँ विचार
अपने असली रूप में दिखाई देते हैं।
और जब
वह लौटकर आती है,
तो साथ लाती है
एक अजीब-सी स्पष्टता
कि मनुष्य
दुनिया की आवाज़ों से नहीं,
बल्कि
अपनी ही ख़ामोशी से
सबसे ज़्यादा सीखता है।
मुकेश ,,
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