तुम्हारे भीतर छिपा हुआ ब्रह्म
बहुत बार
मैंने ब्रह्म को
आकाश की अनंतता में खोजा
तारों की भीड़ में,
ग्रहों की परिक्रमा में,
उस मौन में
जो ब्रह्मांड की गहराई से उठता है।
ऋषियों ने कहा
वह सर्वत्र है,
हर कण में
उसकी ही आहट है।
पर यह बात
सिर्फ़ एक विचार लगती रही,
जब तक
मैंने तुम्हें ध्यान से नहीं देखा।
तुम्हारी आँखों की शांति में
एक गहरा आकाश था,
तुम्हारी मुस्कान में
सृष्टि की कोई पुरानी रोशनी।
तब लगा
ब्रह्म
कहीं दूर नहीं छिपा,
वह हर जीवित स्पंदन में
धीरे-धीरे धड़कता है।
तुम्हारे भीतर
जो करुणा है,
जो सहज प्रेम है,
जो बिना कारण
किसी को अपना बना लेने की क्षमता है
वही तो
उस अनंत का संकेत है।
तब समझ आया—
ब्रह्म
किसी मंदिर की दीवारों में बंद नहीं,
न ही केवल
ग्रंथों के श्लोकों में।
वह तो
मनुष्य के भीतर
एक शांत ज्योति की तरह छिपा है।
और जब मैं
तुम्हारी आँखों में देखता हूँ,
तो लगता है
मानो उस ज्योति का
एक छोटा-सा द्वार खुल गया हो।
तब मन
धीरे से कहता है
शायद
जिस ब्रह्म को
मैं ब्रह्मांड में खोज रहा था,
वह
चुपचाप
तुम्हारे भीतर
मुस्कुरा रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment