गुरुत्व का मौन संगीत
गुरुत्व
कोई घोष नहीं करता
वह स्वर है,
पर श्रव्य नहीं।
दो कण
जब एक-दूसरे की ओर
अल्प-सा झुकते हैं,
वहीं से शुरू होता है
उस संगीत का पहला सुर।
न्यूटन ने
उसे नियम में बाँधा—
द्रव्यमान और दूरी का अनुपात।
पर वह केवल गणना थी,
राग नहीं।
आइंस्टाइन ने कहा—
स्थान-काल स्वयं वक्र है,
और द्रव्य
उस वक्रता की धुन।
ग्रह
सूर्य के चारों ओर नहीं घूमते,
वे उस वक्र पथ पर चलते हैं
जो गुरुत्व ने रचा है।
आकाशगंगाएँ
इस मौन संगीत की
विशाल लय हैं।
उनकी सर्पिल भुजाएँ
एक धीमी परिक्रमा में,
मानो ब्रह्मांड
दीर्घ आलाप ले रहा हो।
कभी-कभी
दो ब्लैक होल
एक-दूसरे के समीप आते हैं
और स्थान-काल का तंतु
लहरों में काँप उठता है।
वे गुरुत्वीय तरंगें
उस संगीत की
तीव्र तान हैं,
जो प्रकाश-वर्षों पार
डिटेक्टरों तक पहुँचती हैं।
धरती पर
हमारी चाल,
समुद्र की ज्वार-भाटा,
चाँद की स्थिरता
सब उसी अदृश्य लय में बँधे हैं।
गुरुत्व
खींचता नहीं,
जोड़ता है।
वह बिखराव को
संरचना में बदलता है।
तारों का जन्म,
ग्रहों का संतुलन,
निहारिकाओं का सघन होना
सब उसी मौन संगीत के
विभिन्न राग हैं।
हमारे भीतर भी
एक सूक्ष्म प्रतिध्वनि है
धड़कनों का भार,
पाँवों का धरती से लगना,
रक्त का नीचे की ओर बहना।
गुरुत्व का यह संगीत
कभी थमता नहीं।
वह अनवरत,
अदृश्य,
पर सर्वव्यापी है।
ब्रह्मांड
एक विशाल वाद्य है
और गुरुत्व
उसका मौन,
पर अनिवार्य
स्वर।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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