अकेलेपन का लौटता हुआ आलिंगन
अकेलापन कोई खाली कमरा नहीं,
यह तो एक पूरा विस्तार है
जहाँ दीवारें भी सांस लेती हैं
और सन्नाटा भी तुम्हें पहचानता है।
तुम चलते हो
शहरों की रोशनी में,
लोगों की बातों में,
फिर भी एक अदृश्य दूरी
तुम्हें हर जगह अकेला छोड़ जाती है।
कभी लगता है
तुम किसी को खो आए हो,
पर धीरे-धीरे समझ आता है
शायद तुमने किसी को नहीं,
खुद को ही कहीं छोड़ दिया है।
और फिर एक पल आता है
जब सब शोर थक जाता है,
और भीतर की खामोशी
अपना नाम पुकारती है।
तुम रुकते हो।
कुछ नहीं होता…
फिर भी बहुत कुछ घटता है।
एक हल्की-सी मौजूदगी
तुम्हें चारों ओर से घेर लेती है
ना डराती है,
ना बुलाती है,
बस स्वीकार कर लेती है।
जैसे कोई पुराना संबंध
जिसे तुमने भुला दिया था,
अब चुपचाप लौट आया हो
बिना किसी शिकायत के।
तुम उसे पहचान लेते हो
यह कोई और नहीं,
तुम्हारा ही प्रतिबिंब है,
जो तुम्हें
बहुत देर बाद गले लगाता है।
और उसी आलिंगन में
तुम समझते हो
कि अकेलापन
वियोग नहीं था,
वो तो
तुम्हारे भीतर लौट आने की प्रक्रिया थी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment