अकेलेपन का लौटता हुआ आलिंगन (सूफ़ियाना अंदाज़)
अकेलापन कोई सज़ा नहीं,
यह तो हिज़्र का वह दरिया है
जिसमें रूह उतरकर
अपना ही चेहरा पहचानती है।
तुम जब दुनिया के शोर से लौटते हो,
तो लगता है सब कुछ छूट गया—
पर असल में
तुम उसी की तरफ़ लौट रहे होते हो
जिसे तुमने कभी खोया नहीं था।
यह ख़ामोशी
कोई खालीपन नहीं,
यह तो भरापन है
इतना गहरा कि शब्द डूब जाएँ।
कभी कोई पुकार नहीं आती,
फिर भी एक सदा
भीतर ही भीतर चलती रहती है—
“तू कहाँ है?”
और तुम रुक जाते हो…
क्योंकि यह सवाल बाहर से नहीं,
अंदर से उठा होता है।
फिर धीरे-धीरे
अकेलापन पास आता है
ना किसी रूप में,
ना किसी आवाज़ में
बस एक मौन की तरह।
और वो मौन
तुम्हें छू लेता है,
जैसे कोई बिछड़ा हुआ
लौटकर
कुछ कहे बिना ही गले लग जाए।
उस आलिंगन में
न शिकवा है, न शिकायत
सिर्फ़ एक पहचान है
कि जो तुम ढूँढ रहे थे,
वो कभी तुमसे जुदा हुआ ही नहीं था।
सूफ़ियों की ज़बान में
यह हिज़्र भी वही है,
जो वस्ल की पहली सीढ़ी है।
और जब तुम उसे स्वीकार कर लेते हो
तो समझ आता है,
अकेलापन नहीं था यह,
यह तो
ऊपरवाले की तरफ़ लौटता हुआ
सबसे ख़ामोश सज्दा था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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