वापसी की तरह आता हुआ सन्नाटा
सन्नाटा कभी अचानक नहीं आता,
वो लौटता है
जैसे कोई थका हुआ मुसाफ़िर
लंबे सफ़र के बाद
अपने ही घर की देहलीज़ पर आ खड़ा हो।
पहले थोड़ा शोर होता है
ज़िंदगी की छोटी-छोटी आहटें,
रिश्तों की अधूरी आवाज़ें,
और मन की भागती हुई धड़कनें।
फिर धीरे-धीरे
सब कुछ पीछे छूटने लगता है,
जैसे किसी ने
रौशनी को धीरे-धीरे कम कर दिया हो।
और एक पल आता है
जब कुछ भी नहीं बोलता,
पर सब कुछ सुनाई देने लगता है।
तुम उसे खालीपन समझते हो,
पर वह खाली नहीं होता
वह तो पूरा का पूरा भराव है,
जो अब शब्दों की ज़रूरत से आज़ाद हो चुका है।
सन्नाटा पास आता है
न दस्तक देता है,
न इजाज़त माँगता है,
बस तुम्हारे भीतर
अपनी जगह पहचान लेता है।
और तुम अजीब-सा सुकून महसूस करते हो
जैसे कोई बिछड़ा हुआ
लंबे समय बाद
बिना कुछ कहे लौट आया हो।
तुम समझते हो
यह कोई अंत नहीं,
यह तो एक वापसी है।
जहाँ सन्नाटा भी
तुम्हें अकेला नहीं छोड़ता,
बल्कि तुम्हें
तुम्हीं में लौटा देता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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