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Sunday, 26 April 2026

चंद्रमा की बेचैनी, मेरी रात में उतर आई,

 चंद्रमा की बेचैनी, मेरी रात में उतर आई,

नींद की हर एक किरण, खामोशियों में बिखर आई।


झील-सा मन था कभी, शांत, गहरा, पारदर्शी,

अब लहर-लहर में कोई, अनकही सी लहर आई।


आसमानों से उतरकर, क्यों ये चाँद पूछता है,

किस तड़प की आग दिल में, चुपके-चुपके ठहर आई।


तारों की भीड़ में भी, एक तन्हाई सी क्यूँ है,

जैसे हर रोशनी अपने, अंधेरों से डर आई।


रात के इस सन्नाटे में, कौन मुझसे बोलता है,

चंद्रमा की छाया जैसे, मेरी रूह में घर आई।


वक़्त की शाखों पे बैठी, याद की चिड़िया कहे,

जो अधूरा रह गया था, वो ही फिर से उभर आई।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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