तारों की भीड़ में भी, एक तन्हाई सी क्यूँ है,
चंद्रमा की बेचैनी, दिल में उतर आई क्यूँ है।
नींद की हर दहलीज़ पे, सन्नाटा सा ठहरा,
ख़्वाब की हर इक किरन, लौट कर आई क्यूँ है।
झील सा था मन कभी, शांत, बिल्कुल बेआवाज़,
अब हर इक लहर में ये, हलचल समाई क्यूँ है।
भीड़ में रहते हुए, खुद से ही दूर हूँ मैं,
आईने की आँख में, एक परछाई सी क्यूँ है।
वक़्त के इस मोड़ पर, सब कुछ होते हुए भी,
एक अधूरी सी कोई, चाह समाई क्यूँ है।
रात की चुप चादर में, कौन मुझे पुकारे,
मेरी ही रूह में ये, गूँज पराई सी क्यूँ है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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