एक ----
मै और नीम अँधेरा तहखाना
कई बार ऐसा महसूस होता है,
जैसे मैं किसी नीम-अँधेरे तहख़ाने में हूँ
जहाँ दीवारों पर जमी सीलन
सिर्फ पानी नहीं, वक्त की थकी हुई साँसें लगती हैं।
हवा भी यहाँ चलती नहीं,
बस ठहरी रहती है…
जैसे हर लम्हा कहीं अटक गया हो,
और उसकी आवाज़ भी अब बाहर जाने से डरती हो।
इस सन्नाटे में एक अजीब-सी गूंज है—
कोई नाम नहीं लेता,
मगर हर चीज़ उसी का इशारा करती है…
जैसे उदासी ने यहाँ अपना घर नहीं,
अपना वजूद बना लिया हो।
कभी-कभी लगता है
कि मैं इस अँधेरे में खोया नहीं हूँ,
बल्कि यहीं का हिस्सा बन गया हूँ—
जैसे रौशनी अब मुझ तक पहुँचने से पहले ही थक जाती हो।
और फिर भी…
दिल के किसी बहुत गहरे कोने में
एक हल्की-सी रौशनी अब भी बाकी है
कमज़ोर, काँपती हुई,
मगर ज़िंदा…
शायद वही रौशनी
मुझे हर रोज़ ये यक़ीन दिलाती है
कि ये तहख़ाना आख़िरी सच नहीं है,
बस एक लंबा, ख़ामोश इंतज़ार है…
तहख़ाने की सियाही में भी इक चिंगारी रही,
मैं पूरी तरह बुझा नहीं, बस थोड़ी-सी रोशनी रही।
दो -------
भीतर की दरारों में उतरती आवाज़
और फिर…
उस तहख़ाने की दीवारों पर
कहीं बहुत बारीक-सी दरारें नज़र आने लगती हैं—
पहले तो लगता है, ये भी वहम है…
मगर धीरे-धीरे उन्हीं दरारों से
कुछ हल्की-सी आहटें रिसने लगती हैं।
जैसे ऊपर कहीं ज़िंदगी अब भी चल रही हो,
कोई हँस रहा हो,
कोई पुकार रहा हो…
और उनकी आवाज़ें
इन मोटी, भीगी हुई दीवारों से टकराकर
मेरे तक आते-आते
बस एक हल्की-सी कंपन बन जाती हैं।
मैं कान लगाकर सुनता हूँ
मगर कुछ साफ़ नहीं सुनाई देता,
बस इतना अहसास होता है
कि मैं अकेला नहीं हूँ…
फिर भी, अजीब बात है
ये जानकर भी तन्हाई कम नहीं होती।
उँगलियों से जब उन दरारों को छूता हूँ,
तो सीलन के साथ-साथ
एक ठंडी-सी सिहरन दिल तक उतर जाती है
जैसे ये दीवारें सिर्फ पत्थर की नहीं,
मेरे अपने अंदर की बनी हुई हों।
कभी-कभी जी चाहता है
कि इन्हें तोड़ दूँ,
एक ही झटके में सब कुछ गिरा दूँ
मगर फिर डर लगता है…
कि अगर ये दीवारें गिर गईं,
तो जो कुछ बचा है अंदर,
वो भी बिखर न जाए।
और इसी डर और चाहत के बीच
मैं फिर चुप हो जाता हूँ
उसी तहख़ाने में,
उसी सन्नाटे में…
मगर अब एक फर्क है
अब अँधेरा बिल्कुल बेआवाज़ नहीं रहा,
उसमें कहीं न कहीं
मेरी अपनी धड़कनों की गूंज शामिल हो गई है…
दरारों से ही सही, कोई सदा तो आई है,
इस खामोश अँधेरे में मेरी ही परछाईं है।
तीन ----------
अंदर का ढहता हुआ शहर
और फिर…
एक दिन यूँ लगता है
कि ये तहख़ाना सिर्फ चार दीवारें नहीं,
मेरे अंदर बसा एक पूरा शहर है
जो धीरे-धीरे ढह रहा है।
कोई शोर नहीं होता,
कोई मलबा गिरने की आवाज़ भी नहीं…
बस एहसास होता है
कि कुछ बहुत अपना, बहुत गहरा
चुपचाप टूटता जा रहा है।
यादों की गलियाँ,
जहाँ कभी तुम्हारी आहट गूँजती थी,
अब वीरान पड़ी हैं
जैसे किसी ने वहाँ से वक़्त ही उठा लिया हो।
मैं उन रास्तों पर चलता हूँ,
जहाँ कभी मुस्कुराहटें बिखरी थीं
अब हर मोड़ पर सिर्फ साया मिलता है,
और हर साये में
तुम्हारी गैर-मौजूदगी का बोझ।
दिल के किसी कोने में
अब भी कुछ ज़िंदा है
मगर वो ज़िंदगी नहीं,
बस एक आदत है…
धड़कने की आदत,
याद करने की आदत,
और हर बार टूटकर भी
खुद को समेट लेने की आदत।
कभी सोचता हूँ
क्या ये शहर फिर से बस पाएगा?
या ये खंडहर ही अब मेरी पहचान हैं…
और तभी…
एक हल्की-सी धूप
किसी टूटी हुई छत से अंदर उतरती है—
बहुत कम, बहुत फीकी,
मगर उतनी कि
अँधेरे को पूरी तरह सच साबित न होने दे।
शायद…
उम्मीद हमेशा पूरी रौशनी बनकर नहीं आती,
कभी-कभी वो बस
एक ज़िद होती है
जिंदा रहने की।
ढहते हुए शहर में भी एक दिया जलता रहा,
मैं टूटता रहा मगर अंदर कुछ पलता रहा।
चार ---------
राख में दबे हुए उजाले
और फिर…
जब सब कुछ जैसे थम-सा जाता है,
ढहते हुए उस अंदरूनी शहर के बीच
बस धूल, राख और बिखरे हुए लम्हे रह जाते हैं—
तभी एहसास होता है
कि ख़ामोशी भी कभी-कभी बहुत ऊँची आवाज़ में बोलती है।
मैं उन राख बने एहसासों को
उँगलियों से कुरेदता हूँ
शायद कोई चिंगारी मिल जाए,
कोई अधजला ख़्वाब,
जो अब भी अपना नाम पुकार सके…
हवा यहाँ भी चलती है
मगर अब वो सिहरन नहीं लाती,
बस राख को उड़ाकर
हर चीज़ को और धुंधला कर देती है—
जैसे यादें अब शक्ल खो रही हों,
मगर असर अब भी उतना ही गहरा हो।
कभी-कभी लगता है
कि मैंने तुम्हें भुला दिया है—
मगर फिर एक मामूली-सी बात,
एक हल्की-सी खुशबू,
या कोई अधूरी-सी धुन…
सब कुछ फिर से ज़िंदा कर देती है।
ये कैसा रिश्ता है—
जो खत्म होकर भी खत्म नहीं होता,
जो जलकर राख हो गया,
मगर उसकी गर्मी अब भी बाकी है…
और फिर…
उसी राख के नीचे
कहीं बहुत गहराई में
एक बहुत छोटी-सी,
बहुत जिद्दी-सी चिंगारी मिलती है
वो उम्मीद नहीं,
वो मोहब्बत भी नहीं…
शायद वो बस
“तुम” हो—
जो हर हाल में
किसी न किसी रूप में बाकी रहते हो।
राख में दबे थे कुछ ख्वाब, उन्हें छेड़ा तो जले,
तू गया भी नहीं पूरी तरह, ये सच फिर से खुले।
मुकेश ,,,,,,,,
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