लोहे की कीलों वाला पुराना दरवाज़ा
वह दरवाज़ा
सिर्फ़ लकड़ी का नहीं था
उस पर जड़ी थीं
लोहे की मोटी कीलें,
जैसे किसी ने समय को
ठोक-ठोक कर
उसे मज़बूत बनाया हो।
हर कील में एक कहानी थी
किसी ने डर के लिए ठोकी,
किसी ने सुरक्षा के लिए,
और कुछ कीलें
सिर्फ़ आदत में गड़ी रह गईं।
जब हवा चलती,
दरवाज़ा काँपता नहीं था,
बस एक भारी-सी आवाज़ करता
जैसे सदियों की थकान
अपने ही वजन से बोल रही हो।
मैंने उँगलियों से छुआ था उसे,
ठंडी थी लकड़ी,
पर कीलें गरम
शायद धूप नहीं,
यादों ने उन्हें तपाया था।
कहते हैं,
पुराने दरवाज़े जल्दी नहीं खुलते,
उन्हें मनाना पड़ता है
धीरे-धीरे,
जैसे किसी बूढ़े को
अपनी कहानी सुनाने के लिए।
और जब वह खुलता है,
तो सिर्फ़ एक कमरा नहीं,
पूरी एक उम्र खुलती है
जहाँ हर कील
अब भी थामे हुए है
कुछ टूटने से पहले का क्षण।
शायद
हम सबके भीतर
एक ऐसा ही दरवाज़ा है
लोहे की कीलों से जड़ा हुआ,
जिसे हमने ही
मज़बूत भी किया
और बंद भी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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