जंग लगा दरवाज़ा
वह दरवाज़ा
कभी खुलता था आसानी से
एक हल्की-सी धक्का,
और दुनिया बदल जाती थी।
अब उस पर
जंग चढ़ आई है
धीरे-धीरे, बिना आवाज़ के,
जैसे रिश्तों पर चढ़ती है
अनकही बातों की परत।
कुंडी पकड़ो तो हाथ रंग जाता है,
भूरा-सा, खुरदुरा
जैसे समय ने
अपनी उँगलियों के निशान
उस पर छोड़ दिए हों।
मैंने उसे खोलने की कोशिश की,
वह कराहा
एक लंबी, थकी हुई आवाज़,
जैसे कोई बहुत दिनों बाद
अपना दुख कह रहा हो।
कभी-कभी
दरवाज़े इसलिए बंद नहीं होते
कि उन्हें बंद किया गया,
बल्कि इसलिए
कि उन्हें खोला ही नहीं गया।
बारिशें आईं,
धूप भी पड़ी,
पर किसी ने
उस जंग को छूकर
साफ़ करने की कोशिश नहीं की।
अब वह दरवाज़ा
खुल भी जाए
तो शायद वही कमरा न मिले
क्योंकि जंग सिर्फ़ लोहे पर नहीं,
अंदर की चीज़ों पर भी लग जाती है।
और हम
हम खड़े रहते हैं सामने,
हाथ बढ़ाते हैं,
फिर वापस खींच लेते हैं
डरते हुए
कि कहीं वह आवाज़
हमारे भीतर तक न उतर जाए।
शायद
हर जंग लगा दरवाज़ा
बस एक बार
छुए जाने का इंतज़ार करता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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