सुगन्ध
सुगन्ध का कोई घर नहीं होता,
फिर भी वह घरों में बस जाती है।
वह फूलों में जन्म लेती है,
पर फूलों से अधिक देर तक जीवित रहती है।
कभी किसी पुरानी पुस्तक के पन्नों में,
कभी बरसात से भीगी मिट्टी में,
कभी माँ की साड़ी की तहों में,
तो कभी किसी ऐसे प्रेम में
जिसका नाम अब स्मृति से मिट चुका है।
सुगन्ध दिखाई नहीं देती,
फिर भी वह रास्ते बना लेती है।
वर्षों बाद भी
एक क्षीण-सी महक
मनुष्य को उन गलियों तक ले जा सकती है
जहाँ उसका शरीर नहीं,
केवल उसका अतीत रहता है।
अद्भुत है कि स्मृति अक्सर चेहरों को भूल जाती है,
पर सुगन्धों को नहीं।
हँसी का स्वर धुँधला पड़ जाता है,
बातें समय की धूल में दब जाती हैं,
किन्तु कहीं से आती हुई
रजनीगन्धा, चन्दन, या अगरबत्ती की एक लहर
अचानक बीते हुए वर्षों का द्वार खोल देती है।
शायद इसीलिए
ईश्वर ने सुगन्ध को आकार नहीं दिया।
यदि उसका कोई रूप होता,
तो वह भी एक दिन बूढ़ा हो जाता।
पर सुगन्ध तो समय की पकड़ से बाहर है
वह आज भी वैसी ही है
जैसी किसी प्राचीन मंदिर में थी,
जैसी किसी नववधू के केशों में थी,
जैसी किसी विरहिणी के पत्र पर लगी रही होगी।
सुगन्ध वस्तुओं में नहीं रहती,
वह उनके अनुभव में रहती है।
वह फूल से कम,
और मनुष्य के हृदय से अधिक जुड़ी होती है।
इसीलिए जब कोई बहुत प्रिय व्यक्ति
हमारे जीवन से चला जाता है,
तो सबसे अन्त में उसकी आवाज़ नहीं,
उसकी कोई सुगन्ध रह जाती है
तकिये पर,
अलमारी में,
किसी पुराने पत्र में,
या आत्मा के किसी अज्ञात कोने में।
और तब समझ में आता है
कि संसार में सबसे अधिक स्थायी वस्तुएँ
वे हैं जिन्हें छुआ नहीं जा सकता।
प्रेम, स्मृति, प्रार्थना
और सुगन्ध।
वे आती हैं,
क्षण भर ठहरती हैं,
और फिर अदृश्य हो जाती हैं
पर उनके जाने के बाद भी
मनुष्य बहुत देर तक
उनके साथ जीता रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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