कुछ घाव ऐसे थे
जिन्हें मैंने कभी छिपाया नहीं
उन्हें दिखाता रहा लोगों को
उन पर कविताएँ लिखीं
उनके बारे में बातें कीं
मगर जो सबसे गहरा घाव था
उसकी ओर मैं स्वयं भी नहीं देखता था
वह किसी चोट की तरह नहीं
एक अनुपस्थिति की तरह था
जैसे जीवन में कुछ होना चाहिए था
और वह कभी हुआ ही नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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